मोहल्ले के बच्चों को खेलते देख, दो मिनट को रुकिये,
ढंग का वार्म-अप, हलकी-फ़ुल्की कसरत (exercise) कर के दिखा दीजिये,
थोड़ा स्टांस सिखाइये, थोड़ा उनको हाथ सम्भालना/चलाना सिखाइये,
कदमों की चाल, गर्दन की हरकत और साँसों की तारतम्यता का महत्व बतलाइये,
उनकी पसंद के खेलों के दिग्गजों से परिचित करायें (गूगल/विकिपीडिया मुफ़्त हैं फ़िलहाल )
खेलों के नियमों और बारीकियों से रू-ब-रू करायें,
महीने-दो महीने में एक बॉल/फ़ुटबॉल/शटल-कॉक इत्यादि लाकर यूँ ही दे दीजिये,
और जो अगर उसी बॉल से काँच टूट जाये तो गुस्सा करने के बजाय मुस्कुरा के टाल जाइये,
बस इतना कह के बॉल उछल दीजिये कि “थोड़ा सम्भाल के खेलो, आंटी ने देख लिया होता तो बॉल ज़ब्त हो जाती|”
अगर पार्क में बुज़ुर्ग बैठते-टहलते हों तो उनका और बच्चों के भाग-दौड़ भरे खेलों का समय अलग-अलग हो|
जो बेहतरीन हों, ज़हीन हों, उन्हें और प्रत्साहित कीजिये,
उनके माता-पिता से मिलिए जुलिये,
खेलों के प्रति उन्हें एक सकारात्मक रुख पैदा करना सिखाइये|
ज़रूरी नहीं कि हर बच्चे को पुलेला गोपीचंद मिल ही जायें, पर आपने खुद को कब उनसे कम आँका था, तो उठाइये बीड़ा...
सारी ज़िम्मेदारी कपिल देव, प्रकाश पादुकोण, मिल्खा सिंह, पी. टी. उषा के बच्चे ही उठायें, ज़रूरी तो नहीं|
थोड़ा इन बच्चों को भी पंख फ़ैलाने दें,
आस्मां और भी हैं...
और हाँ, सनद रहे कि “शर्मा जी के लड़के ने कितने महीन कद्दू में तीर मारा, ये वाली कहानियाँ सुनाना बन्द करना तो खाने में नमक की तरह ज़रूरी है|”
‘नमस्कार!’
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