अपने हिस्से की रौशनी...
क्यूँ नहीं तोड़ लाते तुम वो रौशनी?
जो निस्संदेह तुम्हारे हिस्से की है !
हाँ ! तुम ही हो उसके हक़दार |
नहीं बात ये किसी मनगढ़ंत किस्से की है |
कब रहा है साथ ज़माना, पीछे छूटने वालों के ?
लगाओ दम, बढ़ो आगे,
करो सूरज को काबू |
उलाहना नहीं, इसे मेरी ललकार समझो !
बोओ सपनों के बीज,
सींचो उनको परिश्रम से,
डालो थोड़ी दृढ-प्रतिज्ञ सी खाद,
और फिर, बढ़ने दो...
बढ़ने दो, और भी बढ़ने दो...
इस पौधे को, सपने के ,
अपने |
तपने दो !
बढ़ने दो |
मंझने दो |
होने दो थोडा और भी मज़बूत...
पहुँचने दो, सूरज तक |
छोड़ इस अनचाहे अँधेरे को पीछे,
एकटक देखो इस रौशनी को ;
घूरते रहो ! उसके अन्दर तक |
इस रौशनी को,
जो शायद है बैठी,
किसी योग्य विजेता की मूक प्रतीक्षा में,
अपलक ...
वो, जो वर्षों, दशकों और शायद सदियों से,
भोग रहे हैं, उसे;
तुम्हारे पसीने से पनपे ,
उस पेड़ की डाल पर बैठने वाले;
उस पर अधिकार जमा,
उस रौशनी को घूरने वाले;
उस को अपनी नीची निगाहों से गन्दा करने वाले;
अपनी उन मंशाओं से उसका चीर-हरण करने वाले;
उसका मोल ना जान भी उसका दाम लगाने वाले;
उसे अपनी पटरानी समझ कहीं भी दिखावा करने वाले;
उस अनार्जित कीर्ति को अपमानित करने वाले
;
उस अलौकिक वैभव को निज संपत्ति समझने वाले;
और ना जाने किन-किन तरीकों से उसका तिरस्कार करने वालों से...
क्या बचाना ना होगा उस रौशनी को ?
मैं तो तोड़ के लाऊंगा,
अपने हिस्से की रौशनी !
और तुम ?