** मैं बस तुम्हें देखता हूँ... **
जो करते थे मुहब्बत की बातें,
खाते थे कसमें लइया सी, मुट्ठी भर-भर
बिखेरते उनको नफ़रतें देखता हूँ...
वो जिनकी चाय में अदरक न हो,
पर अमन ज़रूर होता था,
उनको करते कफ़न की दलाली देखता हूँ,
वो जो कहते थे कि है भाईचारे में दुनिया,
और ये कि ‘मियाँ क्या तुम अलग हो?’
डालते उनको दरारें इस मुल्क में देखता हूँ ...
वो जो रुकते थे कि सलामत हो न भाई मेरे,
और जो पूछते थे गाँव-पड़ोसियों के हाल,
उसी मोहल्ले में आगजनी करते देखता हूँ...
मैं देखता हूँ मेरे हिन्द की लुट रही अस्मत
और उड़ती धज्जियाँ इस जम्हूरियत की,
संग हो रही नीलामी अखबारों में विदेशी देखता हूँ...
वो जिन्होंने माना था बापू को बापू अपना,
और चाचा नेहरु के फाख्तों पर भरते थे दम
उन्हें बच्चों पर उछालते पेट्रोल बम देखता हूँ...
मैं देखता हूँ कैसे होता है व्यापार डर का,
और कैसे सीधे किये जाते हैं उल्लू अपने,
और तुमको ये सब ‘मैनेज’ करते देखता हूँ...
और देखता हूँ ये भी कि ये नहीं है वो भारत,
के जिसमें हुए थे पैदा, तुम भी-हम भी,
इसकी खोदते नींव तुम्हें बिन थके देखता हूँ...
नहीं, अब रोकने का दिल हरगिज़ नहीं है,
के रोग बढ़ने के बाद रुकता नहीं है,
नहीं रोक सकता कि तुम अब भी हो अपने,
फिर खुद से दूर जाते तुम्हें देखता हूँ...
इस मुल्क को गरियाते तुम्हें देखता हूँ...
इसका बेइंतेहा माखौल बनाते तुम्हें देखता हूँ...
इसकी मुहब्बत की दीवारें गिराते तुम्हें देखता हूँ...
इसके भाईचारे की धज्जियाँ उड़ाते तुम्हें देखता हूँ...
इसकी सरज़मीं को समशान बनाते तुम्हें देखता हूँ...
मैं देखता हूँ कि तुम लौट आओ कुछ कर अब भी,
पर तुम्हारे आकाओं की जेबें भरी हैं,
पर नहीं भरा है दिल उनका, ये भी देखता हूँ...
और नहीं थके हो तुम, ये भी देखता हूँ...
ना खुली हैं और शायद ही अब खुलेंगी आँखें तुम्हारे,
के तुम धुत हो नशे में, मैं ये देखता हूँ...
के तुम धुत हो नशे में, मैं ये देखता हूँ...
#भईया_उवाच
#देश_आजकल