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Sunday, 11 August 2019

कम्पनी रूल : भाग -01


कम्पनी रूल : भाग -01

एक सेठ थे,  बड़े रईस और खासे रसूख वाले| 
उनके पहले उनकी माता जी  व्यापार संभालती थीं|  हालाँकि  माता जी  को भी व्यापार  विरासत में मिला था |  उनकी कोई तालीम नही हुई थी उस सिलसिले में,  पर चूंकि वो अकेली बेटी थीं  और बचपन से अपने पिता जी के साथ रही थीं, तो घर-बाहर दोनों का   अच्छा  ज्ञान था उन्हें|   कच्चा माल कहाँ से आना है,  कैसे और किन विधियों से माल  तैयार होना है,  कितना रंग, कितना  इत्र,  कितना बाकी  कुछ;  सब बहुत अच्छे से आता था उन्हें|
पिता जी के न रहने के बाद कुछ दिन तो चाचा  ने देखा व्यापार|  एक बार व्यापार के सिलसिले में ही चाचा दूर देश गए थे और वहीं   अचानक  उनकी   तबियत ऐसी बिगड़ी कि  उन्हें अस्पताल में  भर्ती करना पड़ा |  और जो  गए तो ऐसा कि  दोबारा घर की  डेहरी नसीब न हुई|  उन के जाने के  बाद अपने  सेठ जी की माता जी ने गद्दी संभाली |
कहते हैं न  कि  जो सिखाई किताबों में नहीं मिलती अनुभव की गलियों में मिल जाती है|  तो बस माता जी अनुभव की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों को कुछ इस तरह नाप चुकी थीं  कि अब कोई भी पगडण्डी या  हाइ-वे उन्हें डिगा नहीं सकता था|  अभी तक जो कारोबार था वो  पुराने ढर्रे का था|  पर अब बाज़ार में नयी-नयी दुकाने सजने लगीं थीं|  कुछ नए मुल्ले भी  आ गए थे, बेमौसम से  सस्ते प्याज लेकर|  तभी एक टेण्डर आया,  पड़ोसी देश का|  अब माता जी को तो पुराने तरीके से ज़बानी  व्यापार   का अनुभव था और ये  टेण्डर-वेंडर ठहरे  नया शिगूफ़ा |  सबने सोचा कि  अकेली औरत क्या ही करेगी|  पर माता जी को तो जैसे माता ही सवार थीं|  कूद पड़ीं मैदान में और टेण्डर उनके नाम हुआ|  नाम रखा गया  ‘बांग्लादेश’|

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