कम्पनी रूल : भाग -01
एक सेठ थे, बड़े रईस और खासे रसूख वाले|
उनके पहले उनकी माता जी व्यापार संभालती थीं| हालाँकि माता जी को भी व्यापार विरासत में मिला था | उनकी कोई तालीम नही हुई थी उस सिलसिले में, पर चूंकि वो अकेली बेटी थीं और बचपन से अपने पिता जी के साथ रही थीं, तो घर-बाहर दोनों का अच्छा ज्ञान था उन्हें| कच्चा माल कहाँ से आना है, कैसे और किन विधियों से माल तैयार होना है, कितना रंग, कितना इत्र, कितना बाकी कुछ; सब बहुत अच्छे से आता था उन्हें|
पिता जी के न रहने के बाद कुछ दिन तो चाचा ने देखा व्यापार| एक बार व्यापार के सिलसिले में ही चाचा दूर देश गए थे और वहीं अचानक उनकी तबियत ऐसी बिगड़ी कि उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा | और जो गए तो ऐसा कि दोबारा घर की डेहरी नसीब न हुई| उन के जाने के बाद अपने सेठ जी की माता जी ने गद्दी संभाली |
कहते हैं न कि जो सिखाई किताबों में नहीं मिलती अनुभव की गलियों में मिल जाती है| तो बस माता जी अनुभव की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों को कुछ इस तरह नाप चुकी थीं कि अब कोई भी पगडण्डी या हाइ-वे उन्हें डिगा नहीं सकता था| अभी तक जो कारोबार था वो पुराने ढर्रे का था| पर अब बाज़ार में नयी-नयी दुकाने सजने लगीं थीं| कुछ नए मुल्ले भी आ गए थे, बेमौसम से सस्ते प्याज लेकर| तभी एक टेण्डर आया, पड़ोसी देश का| अब माता जी को तो पुराने तरीके से ज़बानी व्यापार का अनुभव था और ये टेण्डर-वेंडर ठहरे नया शिगूफ़ा | सबने सोचा कि अकेली औरत क्या ही करेगी| पर माता जी को तो जैसे माता ही सवार थीं| कूद पड़ीं मैदान में और टेण्डर उनके नाम हुआ| नाम रखा गया ‘बांग्लादेश’|
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