अच्छा सुनो!
मिलो किसी दिन,
किसी किताबघर में|
कुछ देर बैठेंगे,
कुछ क़िस्से सुनाएंगे,
सुना है
वहाँ पैसे नहीं लगते,
वक़्त बिताने के,
क़िस्से पढ़ने के,
क़िस्से सुनाने के...
पढ़ेंगे वो सारे क़िस्से,
कहे-अनकहे...
सुने-अनसुने...
और खोल कर पढ़ेंगे
वहाँ रखी किताबें,
सारी की सारी।
और क़िस्से भी
जो निकलने को होंगे
अपनी ही किताबों से...
जेबें खाली हैं तो क्या,
क़िस्से अब भी काफ़ी हैं,
और भी क़िस्से बुनने हैं,
वो सभी छोटे-बड़े, जो
क़िस्से अब भी अपने हैं...
और तो और,
क़िस्से लिखने के अब भी पैसे नहीं लगते,
और पैसे नहीं लगते क़िस्से सुनाने के,
और ना ही क़िस्से बनाने के,
शायद...
#किताबघर
#क़िस्से