वो खड़ा रहता है
बरगद के इक पेड़ सा,
लेबर रूम के बाहर,
नगर निगम के दफ़्तर की खिड़की पर,
स्कूल के गेट पर,
कॉलेज की सीढ़ी पर...
बैठा रहता है शांत,
अन्दर से उद्विग्न,
बाहर से निर्द्वंद्व,
विवाह के वेदी के बगल,
करता है चौकीदारी, दसों पहर,
अपनी अगली पीढ़ी पर...
वो बस बहता रहता है,
एक नदी की तरह,
बेपरवाह,
अपने काम से काम रखता,
राह के नुकीले पत्थरों को गोल करता हुआ,
सारी अच्छाई उतराता और
गन्दगी सगरी खपा लेता,
और इस सब के बीच,
कुछ भी नहीं कहता,
बस चलता रहता है...
वो होता है सरकारी नल सा,
कि जिसे जब ज़रूरत हो,
आये और बुझा ले अपनी प्यास,
या कि धो ले हाथ-मुँह,
और छोड़ जाए खुला हुआ,
कुल्ला करने के बाद, जी भर|
पर वो रहता है वहीं,
बिना किसी अपेक्षा या शिकायत के,
किसी अगले की प्यास बुझाने को...
वो होता है जैसे किसी लोकतन्त्र सा,
सब कुछ देखता-सुनता,
पर कुछ न कहता,
पर करता अनवरत रक्षा,
हर किसी की,
उसके अधिकारों की,
सरोकारों की,
जुटा रहता अनथक,
स्वत्व को भुला, समष्टि में जी जाने को...
वो तो होता है जैसे किसी इतहास सा,
अभिशापित...
सब पता होते हुए भी
निष्पक्ष रहे जाने को|
बहुत कुछ होते हुए भी
कुछ न कह पाने को;
सब कुछ रहते हुये भी
उपेक्षित रह जाने को...
वो होता है उस चुम्बक सा,
जो समेटे रहता है कुनबे को,
कस कर, जकड़ कर...
और जब होता है विकास
या पड़ती है चोट,
उसे रहना पड़ता है दूर,
समध्रुवीय होते हुए भी
अपने ही अंश से,
जाने क्या-क्या सहना पड़ता है,
एक बेपरवाह युवक से पिता हो जाने को...
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