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Wednesday, 21 December 2016
Start where you are…
Tuesday, 15 November 2016
जश्न अँधेरे का!
सुनो !
चलो मनाते है जश्न...
"जश्न ?"
"हाँ, जश्न अँधेरे का! "
"अँधेरे का ? "
"हाँ, अँधेरे का !"
"यही अँधेरा , जो स्याह है,
थोड़ा अकेला भी,
भटका हुआ सा,
गुमनाम..."
"यही अँधेरा जो प्रतीक है,
हार का,
रात का,
परछांई का,
निराशा का ;
दिन-ब-दिन कम होती,
उस डूबती प्रत्याशा का !"
"अँधेरे का भी कोई भला जश्न होता है?"
"उसका क्या कोई जश्न मनाता है?"
"अरे ! तो क्या हुआ? हम मनाएंगे न !!"
अँधेरा ये,
सच्चा है,
इसलिए एकाकी है;
बाकी सब जब बीत लिए,
ये अँधेरा ही रहता बाकी है!
उजाले का क्या है?
जो रंग डालो,
वो उसका हो लेता है।
सराहो ज़रा इसे,
इस अँधेरे को ,
सब को समा लेता खुद में ;
और खुद के रंग को नही खोता है !
बादल से,
काजल से,
उन चंचल पलकों की हलचल से,
उस तालाब की फैली काई से,
उस युवा स्तब्ध अमराई से,
इस कंक्रीट से चिपके तार से;
उस रेंगती मोटर के धुएं से,
उस सूखे पड़ते कुएं से;
इन बिजली के नंगे तारों से,
उन टूटते, डूबते सितारों से;
उस कच्चे तेल की घानी से,
उस जमे, ठहरे पानी से;
इन पहियों की घिसावट से,
उस बच्चे की कच्ची लिखावट से;
उस टूटी पेन्सिल की नोक से ,
उस ढोंगी तांत्रिक की टोक से ;
उसके उस पुराने त्रिशूल से,
उस पुश्तैनी हवेली की जमी धूल से;
उस हवेली के उस मुंडेर से,
उस सरसों के बिखरे ढेर से;
उस सरसों से निकली खील से,
उस जंगल में मरते भील से;
उस भील की उन गुफाओं से,
एलोरा की उन कंदराओं से;
अजन्ता की घिसी दीवारों से,
क़ुतुब की झुकती मीनारों से;
क़ुतुब की उस ऊँचाई से,
संसद भवन की गोलाई से;
संसद की उन मेहराबों से,
सुंदरबन के मुहानों से;
सुंदरबन की दलदल से,
एक अशांत युवा की खलबल से;
उस अशांत युवा के प्रयासों से,
उस दलाल-स्ट्रीट के कयासों से;
दलाल-स्ट्रीट के धूर्त विजेताओं से, ज़मीर के बेहिचक विक्रेताओं से;
और जिस भी कोने में पसरा बैठा हो ,
हर उस कोने से;
चलो, ले आते हैं ना,
थोड़ा सा अँधेरा... "
#भईया_उवाच
Monday, 26 September 2016
लो, बड़े हो गये हम।
पहले बड़े होने का मतलब होता था,
अपने फीते खुद बांधना,
खाना अपने हाथों से खाना,
दूध जल्द से जल्द ख़तम करना।
फिर कुछ समय बाद,
बड़े होने का मतलब बदला,
और उसमें शामिल हो गया,
अपने कपड़े खुद धोना,
खेल के आने के बाद चुपचाप पढ़ने बैठना
होम वर्क खुद से करना ।
फिर कुछ समय और बीता,
और बड़े होने के मतलब बदले,
अब जुड़ता गया,
दोस्त सही से चुनना,
घर में सिर्फ चुनिंदा लोगों को लाना,
माँ का हाथ बटाना,
पिता जी के सामने अदब से पेश आना।
और फिर,
एक दिन अचानक,
हम बड़े हो जाते हैं,
रख के उस बचपन को पीछे,
जो शायद अब भी कहीं कुलबुला रहा होता है,
अन्दर;
उठा लेते हैं गट्ठर ज़िम्मेदारियों का,
जिसकी गाँठ बंधी है चुपचाप किये गए वादों से,
माँ की आशाभरी मुस्कानों से,
पिता के ज़्यादातर झूठे गर्व से,
और अपने अन्दर की सामाजिक शर्म से;
और बस,
उन अधजन्मे शिशु से सपनों को छोड़,
बढ़ जाते हैं आगे,
बड़े होने के लिए...
खुद से खुद की रेस में जीतने के लिये,
खुद को ही कहीं पीछे छोड़ कर,
खुद से किये अनगिनत वादों को तोड़ कर,
सपनों के बड़े-बड़े नोटों को पतला सा मोड़ कर,
भूल जाते हैं किसी कोने में छोड़कर,
हसरतों को सुखा देते अपने ही हाथों से,
पूरी तबियत से निचोड़कर,
और बस,
बरबस ही,
बिना इच्छा के,
हो जाते हैं बड़े,
बचपन अभी भी कुलबुला रहा होता है,
कहीं अन्दर,
सपने अभी भी सांस ले रहे होते हैं,
किसी भूले से कोने में,
हसरतों को रौंद कर अपने ही कदमों से,
खुद को खुद से रेस में हराने के लिए,
लो, हो गये हम बड़े।।
Saturday, 17 September 2016
उँगलियाँ ढूंढती हैं तुमको !
तुम होते हो तब भी,
और नहीं होते तब भी,
उंगलियाँ बरबस ही उठ जाती हैं,
पहुँच के आँखों के बीचोंबीच,
नाक के सिराहने पर,
माथे की निचली किनारी पर,
ढूंढती हैं तुमको ।
तुम होते हो तो साथ होता है,
सब कुछ साफ़-साफ़ सा होता है,
सब साफ़-साफ़ दिखता है,
कोई धुंधलका नहीं,
कोई संशय नहीं,
और ग़र नहीं भी होते,
और ऊँगली लौट आती है, बैरंग;
तो मुस्कुरा देता हूँ,
अपनी इस आदत पर...
यही,
बीच वाली ऊँगली से तुम्हे ढूंढने की,
यूँ ही कभी,
यकायक ।
फिर भी,
जैसे भी हो,
साथ तो देते हो,
तुम,
मेरा ...
मेरे चश्मे ।।
#भईया_उवाच्
Wednesday, 3 August 2016
A soldier never dies...
In the feeling of security he gave to the nation;
In the assurance he offered to the citizens at large;
In the valour he wore on his arms;
In the fearlessness he exuded;
In the laughter during the recce operations;
In the Aviators & cigarettes;
In the aura of camouflage uniform;
In the ever shining glistening of combat boots;
In the glory of being revered as a 'Fauzi';
In the silent tears of his lover and wife;
In the never ending blessings of his ever-ageing mother;
In the eternal pride of his effervescent father;
In the omnipresent boasting of his brother;
In the endless waiting of his sister;
In the ever evolving pranks of his buddies;
In the attentive shadow of his runner;
In that never failing aim of his pistol;
In his 'perfection couldn't be bettered' attitude towards target;
In those life draining sessions of training;
In those seasonal escapades from 'The Academy';
In that conscience of 'I am the keeper!'
In that confidence of 'that one single shot';
In the gaity of those 'Extended Chhutti';
In the pains of departing with the Falcons & Bunnys;
In the sleepless nights before a battle;
In the rejoicing of the conquering the target;
In the endless, unmentionable & in explicable emotions and events…