किसी हाई-वे की उड़ती धूल सा,
या कि उसके डिवाइडर पे बेमन से उगाये गए पौधों सा,
पास के सोते (स्रोत) पे मंडराते पक्षी सा,
या कि रात के अँधेरे में चाय तलाशते विद्यार्थी सा,
सड़क पे बिछाए जुगनुओं के जाल सा,
या कि मन में कौंध रहे अनगिनत प्रश्नों के जंजाल सा,
उसी हाई-वे के किनारे बसे किसी खानाबदोश ‘खानदानी हकीम’ सा,
या कि पान-मसाला औ गुटखा बेचते उस परिचित से बूढ़े सा,
चिलचिलाती धुप में पानी तलाशते उस ट्रक ड्राईवर सा,
या कि बी.एम्. डब्ल्यू. किनारे लगा के दिन में ही पेग बनाते उस
‘डिप्रेस्ड’ रईसजादे सा,
भूख से बिलबिलाते उस नवजात सा,
या कि उस नवयौवना के दुर्भाग्यपूर्ण गर्भपात सा,
बाल और दाढ़ी बढ़ाये उस ढोंगी सा,
या कि अपना जीवन न्योछावर कर अगली पीढ़ी का संवारते उस योगी सा,
‘सीमित साधनों’ में आदर्शों को ढोते उस शिक्षक सा,
या कि पेपर लीक कर, हवेली खड़ी करते उस परीक्षक सा,
मिसाईलों पर गर्व करते उस अल्पज्ञ नवयुवक सा,
या कि उसका अर्थ तक ना समझते उस रिक्शा-चालक सा,
ज़मीनी मुद्दों को दरकिनार कर के भी एजेंडा खड़ा कर सकने वाले स्वयंभू नेताओं सा,
या कि उनके सामने असहाय से खड़े, फांसी लगाते युवाओं सा...?
क्या? आखिर क्या है मेरा देश?
ये सब, और ऐसा ही बहुत कुछ...
या कि वो जो हमें परोसा जाता है रोज़,
365 चैनेलों द्वारा, लिविंग रूम की बड़ी सी L C D Screen पर, रोज़?
#भईया_उवाच
#BhaiyaSpeaks
#FarmerSuicide
#BharatDurdasha
Labels
#BhaiyaSpeaks
(51)
#Hindi
(17)
#भईया_उवाच
(15)
#Kavita
(11)
#HindiKavita
(9)
Did I say that ?
(9)
Did I say that?
(8)
#हिंदीकविता
(7)
#हिन्दीकविता
(6)
#कविता
(5)
It happens!!
(5)
Poetry
(5)
Hindi Poetry
(4)
#Life
(3)
हिन्दी कविता
(3)
#
(2)
#ContemporaryIndia
(2)
#HindiPoems
(2)
#Hope
(2)
#आशा
(2)
#घास
(2)
#देश_आजकल
(2)
#भईया_उवाच #देश_आजकल #BhaiyaSpeaks
(2)
#माँ
(2)
#हिंदी
(2)
#ViciousCalledLife
(2)
#AAP
(1)
#Abuse
(1)
#AsianGames2014
(1)
#Atheist
(1)
#Betrayal
(1)
#BhagatSingh
(1)
#CRPF
(1)
#Darkness
(1)
#DelhiElections
(1)
#Democracy
(1)
#Dreams
(1)
#DurgaPuja
(1)
#FarmerSuicide
(1)
#Gorakhpur #JapaneseEncephalitis
(1)
#Kejriwal
(1)
#Kolkata
(1)
#Light
(1)
#Molestation
(1)
#Navratri
(1)
#Pujo
(1)
#RatRace
(1)
#SukmaAttack
(1)
#Sun
(1)
#Time
(1)
#WhyIAmAnAtheist
(1)
#Youth
(1)
#एकाकी_जीवन
(1)
#कर्नाटक_चुनाव #KarnatakaElections2018
(1)
#किताबघर
#क़िस्से #हिन्दी #हिन्दी_कविता
(1)
#पापा #विदाई #श्रद्धांजलि
(1)
#प्रकाश
(1)
#मोहल्ला_संस्कृति
(1)
#रौशनी
(1)
#वक्त
(1)
#शाम
(1)
#शोर
#ज़िन्दगी
#Life #हिन्दी_कविता #हिन्दी #कविता
(1)
#सपने
(1)
#सपने
#Dreams
(1)
#सर्वहारा
(1)
#स्त्री #स्त्री_विमर्श
(1)
#हिन्दी #हिन्दीकविता
(1)
#हिन्दी_कविता
(1)
Happy Holi
(1)
Incredible India
(1)
It happens
(1)
It happens¡
(1)
Sunday
(1)
The forgotten art of #LetterWriting
(1)
अँधेरा
(1)
अवसरवादिता
(1)
इतवार
(1)
उत्तर प्रदेश चुनाव
(1)
कविता
(1)
चलो आज अपने पर खोलते हैं।
(1)
लोकतंत्र
(1)
हिन्दी
(1)
हैप्पी होली
(1)
Thursday, 23 April 2015
कैसा मेरा देश ?
Wednesday, 22 April 2015
~ झूठा ~
कुछ कुरेद उठता है अन्दर,
जब उसे चिथड़ो में लिपटा ,
कूड़े के ढेर में ,
बिलखता या,
छटपटाता सा ,
देखता हूँ,
है झूठा वो ज़रूर,
जिसने कहा था ,
कि हर बच्चे में ,
खुदा का अक्स दिखता है...
~ भटकाव या ठहराव ? ~
अरे!!
सुनो,
एक उलझन सुलझाओगे?
क्या ज़रूरी है भटकाव?
ठहराव के लिए?
शायद...
जैसे अथाह समंदर में तैर के,
ग़र मिले एक बियाबान टापू,
लगेगा वो,
सदा अलभ्य से अमृत सा...
खोये हुए से बचपन सा...
चिढाते हुए औघड़पन सा...
चिर-वांछित यौवन सा...
चमकते हुए इक दर्पण सा...
जो ना मिले उस अपनेपन सा...
एक सुसुप्त उर के स्पंदन सा...
किसी इष्ट के साष्टांग वंदन सा...
मन के शिशु के मूक क्रंदन सा...
उस प्रेयसी के प्रथम चुम्बन सा...
उस विरह वेला के बंधन सा...
उस पुनर्मिलन के आलिंगन सा...
मन के अंतरुद्वेलन सा...
भावनाओं के संवेगन सा...
सफलताओं के संवर्धन सा...
विफलताओं के घर्षण सा...
जीवन के प्रतिपल की अनिश्चितता का...
जल-वायु-गगन-अंतरिक्ष की शाश्वतता का...
अब प्रश्न दूसरा है...
कि ये ठहराव समंदर में था...?
या बहाव टापू में...?
~ रैट रेस ~
एक कोने से आवाज़ आई,
"क्यूँ व्यर्थ खट रहे हो?"
"क्यूँ व्यर्थ खट रहे हो?"
पीछे मुड़ के देखा तो
टिमटिमाता हुआ दिया
एक कुटिल सी मुस्कान लिए
कनखियों से निहार रहा था।
टिमटिमाता हुआ दिया
एक कुटिल सी मुस्कान लिए
कनखियों से निहार रहा था।
कुछ ना सूझा ,
तो मैंने कहा कि
"खट नहीं रहा,
काम है ये मेरा।"
तो मैंने कहा कि
"खट नहीं रहा,
काम है ये मेरा।"
वो अब भी मुस्कुरा रहा था।
और फिर नहीं रहा गया,
तो जोड़ दिया -
"कम से कम
तुम्हारी तरह जल कर,
अपना अस्तित्व तो नहीं गवां रहा।"
तो जोड़ दिया -
"कम से कम
तुम्हारी तरह जल कर,
अपना अस्तित्व तो नहीं गवां रहा।"
वो अब भी मुस्कुरा रहा था;
लौ अब दूसरी ओर थी,
लौ अब दूसरी ओर थी,
और फिर,
एक धीमी सी आवाज़ सुनाई दी -
"हाँ,
पर इस जलने में
कुछ प्रकाश तो है,
कुछ अर्थ तो है।"
एक धीमी सी आवाज़ सुनाई दी -
"हाँ,
पर इस जलने में
कुछ प्रकाश तो है,
कुछ अर्थ तो है।"
बहुत सोचा,
पर फिर भी,
मैं अब निरुत्तर था...
पर फिर भी,
मैं अब निरुत्तर था...
~ मकान है या कि मेरा घर... ~
ये किनारों पे लटके हुए जाले,
पंखों पे जमी हुई धूल,
इधर उधर फैले हुए कूड़े से टुकड़े,
ये बड़ी शिद्दत से गिरने को तैयार प्लास्टर,
शायद गर्मी से बेरंग हो चुकी चन्द किताबें,
उड़-उड़ के अपनी उपस्थिति का एहसास कराते,
ये पत्ते...
और गर्द का ढ़ेर अपने ऊपर ओढ़े,
ऊंघती सी कुछ यादें...
अब ये बताओ,
ज़रा मदद करोगे?
ये समझने में कि,
अब ये सिर्फ मकान है?
या कि मेरा घर...
बतलाओ, करोगे?
~ तौलिया ~
किसी सस्ते ढाबे के वाश बेसिन के साथ टंगे तौलिये सा महसूस करता हूँ,
जब तुम्हे हंसते हुए देखताहूँ;
तुम्हारी नम आँखों की तलहटी में उतर जाना चाहता हूँ,
मगर...
तुम्हारे कंधे पे वो बदलते हाथ,
कमर की गोलाई पे फिसलती वो उँगलियाँ,
और हर शनिवार एक नया पर्स या नेकलेस ,
चुभते हैं इक नश्तर से,
बहुत भीतर तक,
सच में,
फिर लौट आता हूँ,
यथार्थ की वास्तविकता में,
अपने तौलिये होने के अस्तित्व को महसूस करने,
और स्वीकार करने,
इस तथ्य को,
कि, इक तौलिया मात्र ही तो था,
बदलना ही था,
आज या कल...
~ ओस की बूँद ~
दूर कहीं ...
इक ओस की बूँद देख ...
सोचा कुछ राहत होगी,
पहुंची पास,
तो देखा कि,
स्पर्श मात्र से,
खो दिया अस्तित्व अपना,
'उसने भी'...
~ शोकाकुल,
सूखी दूब
सूखी दूब
~ 'कठोर' ~
~ 'कठोर' ~
बैठ आज नदी के किनारे,
महसूस किया उस नमी को,
जो उतर उतर आयी थी,
नदी की गाद से होते हुए,
पास की उपजाऊ मिट्टी में।
बढ़ थोड़ा ऊपर,
पाया कि, कम हुई कुछ नमी,
और नरमी भी,
कभी मुलायम रही गाद ,
अब सूखी मिट्टी बन चुकी थी,
चढ़ ऊपर...
थोड़ा और...
पाया की तलहटी थी,
शुरू होती सी,
उस पहाड़ की,
जो बहुत ही मनोरम था,
थोड़ा दूर से,
चढ़े ज्यों-ज्यों...
कम होती गयी नमी,
खत्म सी होती दिखी नरमी,
जो परिणाम थी, शायद,
वर्षों की धूप, गर्मी और...
... अनवरत से दबाव का!
और अब वो नम, उपजाऊ और नर्म गाद,
बन चुकी थी,
मिट्टी...
शैल...
और अंततः पहाड़...
जो था सूखा,
मरू- सा,
और 'कठोर' !!
बस, शायद इसी तरह,
बन चुका था वो भी,
कठोर...
अव्यक्त तरंग-भाव
नीचे जलती धरती थी,
सर पे आग उगलता सूरज था,
था समीप खड़ा विषुवत रेखा के,
ये शायद मेरा प्रारब्ध ही था,
हाँ, था थोड़ा विचलित,
थोड़ा कवलित,
कुछ इस झुलसती धरती से,
थोड़ा इस रोष दिखाते सूरज से...
फिर सोचा,
क्यूँ होते हो विचलित ?
जब अन्दर शीतल मन है,
बरसाने दो रोष इसको भी आज,
पर क्या ये कुछ शाश्वत सा है?
बस फिर, उसी क्षण में,
सोच बैठता हूँ तुमको,
उस सस्नेह स्पर्श को !
उस विश्वास को जो तुमने दिया था !
उस मुस्कान को जो तुम्हारी आभारी है !
उस आत्मबल को जो तुम्हारे सान्निध्य से उत्पन्न हुआ था !
उस पहल को, जो शायद वक़्त ने की थी !
उस शरारत को, जो आँखों से उतर नहीं पाई अब तक, शायद...
उस शर्म को, जो आँखों में आज भी महसूस सी होती रहती है,
तुम्हारी !
उस ममता को जो उभर ही आती है, तुम जितना भी ना चाहो...
उस उत्कंठा को, जिसे तुमने खानदानी तिजोरी के साथ छुपा रखी है,
उन अव्यक्त तरंग-भावों को, जिनके साथ द्वंद्व छिड़ा रहता है,
हम दोनों का ही !
हर उस क्षण को, जो बिता आया मैं तुम्हारे साथ,
और...
वो भी, जो नहीं बिता सका !
और भी, बहुत कुछ...
बस फिर, ठीक उसी क्षण ,
वो ऊष्मा, वो तपिश, वो जलन, वो तीक्ष्णता,
सब बेमानी से हो जाते हैं, और...
सूरज मित्र सा लगता है,
और ये झुलसाती धरती, पुनश्च माँ सी !!
~ सोन पापड़ी ~ ं
~ सोन पापड़ी ~
अरे, सुनो !
अभी लंच था ना,
तो उसके बाद,
मन हुआ कि कुछ मीठा हो जाये,
तो फाइनली,
सोन पापड़ी पे जा के टिके,
यहाँ, ऑफिस के बेसमेंट में एक दुकान है,
सिगरेट की,
ना-ना, दोबारा शुरू नहीं की भाई,
बस रेफरेंस दे रहा था यार...
अच्छा सुनो,
तो बस वही चेला अपना रखता है ,
पैकेट्स, सोन पापड़ी के भी।
सही थी, ट्रस्ट मी !
नर्म, हल्की मीठी और
पिस्ते की टॉपिंग के साथ...
बस जैसे ही काटने को चलो,
भरभरा के अलग -थलग...
बिखरने सी लगती है;
मग़र,
सच मानो, आनंद आ गया !
और,
बरबस ही आ गयी,
तुम्हारी याद भी,
कुछ ऐसी ही तो हो ना,
तुम भी !!
#भईया_उवाच
#BhaiyaSpeaks
#Soan_Papdi
Subscribe to:
Posts (Atom)