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Thursday, 22 August 2019

परवल का बीज

आज मेस में परवल की सब्जी बनी थी। जान के मन खराब सा हो गया। खाना खाते हुए एक  नये सहकर्मी की 6-7 वर्षीया बेटी भारी चिन्ता में दिखी।  घबराई सी इधर-उधर देखे और रुक-रुक कर एक-दो घूँट पानी पिये जा रही थी।
वो तो जैसे चिन्ता में घुली जा रही थी और वो सज्जन बैठे बस मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे।
हमसे रहा न गया, तो पूछ बैठे कि 'क्या हुआ इनको?'
वो बस हौले से मुस्कुराये और आँख के  इशारे से बेटी  के हाव-भाव देखते रहने को कहा।

हम बिना रुके कौतुकवश देखते रहे।
वो फिर  भी अकुलाती दिखी। 
कुछ देर बाद हमसे देखा न गया,  आख़िरकार पूछना पड़ा, 'इन्हें कोई दिक्कत है क्या?'

वो सज्जन पूरे निर्विकार भाव से बोले 'अरे कुछ नहीं। बस इनको  परवल पसन्द नहीं।'

हम तो खुद ही भरे बैठे थे, तपाक से कूदे 'सही है, परवल भी कोई सब्जी है भला?'

वो हँस पड़े।  हमें अजीब लगा। फिर  हमारी बनती शकल देख कर बोले कि 'अरे बात वो नहीं कि परवल पसन्द नही। मुद्दा यह है कि मैडम ने परवल के साथ उस का बीज भी खा लिया है। अब समस्या ये है कि इनको ये डर सता रहा है कि कहीं इनके पेट  में  परवल का पेड़ न उग आये।'

हमसे  हँसी रोकी न गयी, पर फिर बच्ची का ख़याल कर के सम्भाले खुद को।
उनकी मुस्कान का राज़ अब भी जा का तस बना हुआ था। पूछना ज़रूरी था, तो पूछ ही लिये कि 'वो तो चलिये वो बच्ची है,  ठीक है। पर आपको उसको समझाना चाहिये कि ऐसा नही होगा।'

उनके चेहरे पर मुस्कान अब भी कब्जा किये थी।  बड़े इत्मीनान से बोले,  एक ही बेटी है मेरी और सच में बहुत मासूम है।  मैं चाहता हूँ कि इसकी ये मासूमियत बनी रहे।'

हमने प्रश्न किया 'ऐसे परेशान कर के मासूमियत बचायेंगे?'

वो थोड़ी देर अपने फ़ोन को निहारते रहे, फिर शायद किसी तंद्रा से जागे और बोले। जब तक है तभी तक है ये मासूमियत, वरना तो लोग देश निगल गए और एक डकार भी नही ली।'

अब हम अवाक से उनको ताक रहे थे;
और वो दोबारा अपने फ़ोन को...

#भईया_उवाच्
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