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Wednesday, 28 August 2019

एक स्त्री कभी खाली नहीं होती


~ एक स्त्री कभी खाली नहीं होती ~

एक स्त्री कभी खाली नहीं होती,

वो सदैव भरी होती है संभावनाओं से,

मन से, शरीर से, विचार से संस्कार से,

विरह से, संसर्ग से,  वियोग से,  प्यार  से,

भरी ही रहती है वह...


अपने खालीपन से,  पुरुषत्व से,

दैनिक व्यापर से,  अपनत्व से,

सूक्ष्मता से,  अपने ब्रह्मत्व से,

आस-पास कि निजता से,  उसके अपनों के स्वत्व से,

भरी रहती है वह...


एक स्त्री कभी खाली नही रह सकती,

उस में   पल रहे होते हैं,  कितने ही संसार,

एक किनारे पर सृजन और  आँचल में ध्वंस बाँधे,

वह करती है जाने कितनी ही बाधायें  पार,

सधी सी रहती है वह...


एक स्त्री कभी खाली नही बैठती।

उसके अंदर चल रहा होता है एक बवण्डर,

आशा का, निराशा का, जिज्ञासा का,

और कुछ अधूरी ही रहती पिपासा का...

पूरी से होती है वह...


एक स्त्री कभी मौन नही रहती,

उसके अन्दर चल रहा होता है संवाद,

किसी अनमिली सखी से, इष्ट से, जगत से,

उमड़ते से, मुखर  रहते हैं विचार अनगिनत से...

स्वयं को सम्बोधित करती है वह...


एक स्त्री कभी समय व्यर्थ नही करती,

उसकी निर्द्वन्द्व  आँखों में पल रहे होते हैं  और

वो संजो रही होती है शाम, भविष्य और अपनों को,

अपने छोड़ पूरी करने में लगी दूसरों के सपनों को...

बस व्यस्त रहती है वह...

एक स्त्री कभी खाली नहीं होती...

#स्त्री
#भईया_उवाच्

Monday, 26 August 2019

पी वी सिन्धु स्टार्टर पैक !


मोहल्ले के बच्चों को खेलते देख, दो मिनट को रुकिये,
ढंग का वार्म-अप, हलकी-फ़ुल्की कसरत (exercise) कर के दिखा दीजिये,
थोड़ा स्टांस सिखाइये, थोड़ा उनको हाथ सम्भालना/चलाना सिखाइये,
कदमों की चाल, गर्दन की हरकत और साँसों की तारतम्यता का महत्व बतलाइये,
उनकी पसंद के खेलों के दिग्गजों से परिचित करायें (गूगल/विकिपीडिया मुफ़्त हैं फ़िलहाल )
खेलों के नियमों और बारीकियों से रू-ब-रू करायें,


महीने-दो महीने में एक बॉल/फ़ुटबॉल/शटल-कॉक इत्यादि लाकर यूँ ही दे दीजिये,
और जो अगर उसी बॉल से काँच टूट जाये तो गुस्सा करने के बजाय मुस्कुरा के टाल जाइये,
बस इतना कह के बॉल उछल दीजिये कि “थोड़ा सम्भाल के खेलो, आंटी ने देख लिया होता तो बॉल ज़ब्त हो जाती|”


अगर पार्क में बुज़ुर्ग बैठते-टहलते हों तो उनका और बच्चों के भाग-दौड़ भरे खेलों का समय अलग-अलग हो|

जो बेहतरीन हों, ज़हीन हों, उन्हें और प्रत्साहित कीजिये,
उनके माता-पिता से मिलिए जुलिये,
खेलों के प्रति उन्हें एक सकारात्मक रुख पैदा करना सिखाइये|

ज़रूरी नहीं कि हर बच्चे को पुलेला गोपीचंद मिल ही जायें, पर आपने खुद को कब उनसे कम आँका था, तो उठाइये बीड़ा...

सारी ज़िम्मेदारी कपिल देव, प्रकाश पादुकोण, मिल्खा सिंह, पी. टी. उषा के बच्चे ही उठायें, ज़रूरी तो नहीं|
थोड़ा इन बच्चों को भी पंख फ़ैलाने दें,
आस्मां और भी हैं...


और हाँ, सनद रहे कि “शर्मा जी के लड़के ने कितने महीन कद्दू में तीर मारा, ये वाली कहानियाँ सुनाना बन्द करना तो खाने में नमक की तरह ज़रूरी है|”

‘नमस्कार!’

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