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Saturday, 8 August 2020

अब लोग छत पर नहीं जाया करते...


अब छतें  जुड़ी हुई नहीं होतीं,
ना ही जुड़ते हैं दिल|
अब दरवाज़े  ज़रूरत से ज़्यादा नहीं खुला करते,
ना ही खुल कर मिलते हैं दिल|

अब आँगन साझे नहीं हुआ करते,
ना ही साझी होती हैं मुस्कुराहटें|
अब दिक्कतें निजी मामला हो चली हैं,
और खुशियों में नाचना है पुरानी बातें|

... अब छतें जुडी हुई नहीं होतीं,
ना ही जुड़ पाते हैं दिल|

अब अचार छत पर नहीं सूखा करते,
ना इतवार को बालों को दिखाते हैं अब सूरज |
अब छुड़इय्या दे कर नहीं उड़ाई  जातीं पतंगें
ना ही होती हैं  ज़िरहें  मोहल्लों में अब|

छतों पर अब बिस्तर नहीं लगा करते,
ना ही नालियाँ ढकी जाती हैं अब बारिश में|
अब छई-छप-छई के  खेल नहीं हुआ करते,
ना ही ताश की  बाजियाँ लगती हैं अब |

अब छतें जुडी हुई नहीं होतीं,
ना ही जुड़ पाते हैं दिल|

अब, अब, अब बस ज़िन्दा हैं मकां,
पर बाशिन्दे  नहीं मिला करते,
अब वो पानी के बम्बों पर पड़ोसी नहीं मिला करते।

अब छतों पर कपड़े नहीं सूखते कड़क,
ना ही रिश्तों की गर्मजोशी ताज़ा होती है,

... अब छतें जुडी हुई नहीं होतीं,
ना ही जुड़ पाते हैं दिल|

अब पापड़ों  लाइन नहीं लगा करती छतों पर
ना ही  सुलझाता है अब कोई उलझा माँझा,
अब वो कानाफ़ूसी की कला भी दम तोड़ रही,
ना ही अब खबरें होती हैं छत पर साझा।

अब ना वो लोहरी की मूंगफली  और ना तिल,
ना ही वो नयी फसल की ईख मिला करती है|
ना तो मोहल्ले भर की दादी के किस्से सुनने को,
और ना ही वो सबके दादू की सीख हुआ करती है|

...अब छतें जुडी हुई नहीं होतीं,
ना ही जुड़ पाते हैं दिल|
अब फ़ाटक ज़रा  हौले से खुला करते हैं,
अब लोग नहीं पाते हैं मिल|

#भईया_उवाच
#छत
#मोहल्ला_संस्कृति
#एकाकी_जीवन

Tuesday, 10 March 2020

हैप्पी होली मुबारक़!!

उम्मीद है सब की होली ज़बरदस्त रही होगी।

तो हुआ यूँ कि आज शाम जब होली खेल कर घर लौट रहे थे तो पुराने लखनऊ से  गुजरते वक़्त एक जगह काफ़ी भीड़ इकट्ठी थी। अब चूँकि मुस्लिम बाहुल्य इलाका था और इतनी बकर मचा रखी है पढ़े-लिखे गधों ने तो माथा ठनका कि लो गुरु, निपटा कोई होली के  दिन ही।

फिर  लगा कि दुनिया को पॉज़िटिविटी और हिम्मत का ज्ञान बाँटते हो, ऐसे ही चले जाओगे क्या?

खैर, जैसे-तैसे आगे बढ़े।

भीड़ के बीच झाँक पाना खुद में एक बड़ी मशक्कत थी।
सब के सब बस टूट पड़ना चाह रहे थे उस घर के सामने बने घेरे में।
फिर थोड़ी देर वहाँ खड़े रहे इस उधेड़बुन में कि घुसें या जाने दें।  फिर वही लगा कि ऐसे कैसे जा सकते हो?

हिम्मत कर के गाड़ी से उतरे और सड़क पर जमा भीड़ की ओर बढ़े तो पता चला कि कोई बवाल नही था।  वहाँ ताज़ी गुझिया, खुरमा और नमकपारे बन रहे थे। जालीदार टोपी वाले उसके लिए मजमा लगाए थे।

हँसी आयी और गुस्सा भी कि इतनी सी देर में क्या-क्या नही सोच डाले।

फिर भारत की इस सुन्दरता को सोच मन ही मन मुस्कुराते हुये आगे बढ़े।

भीड़ थी तो स्पीड बहुत कम ही थी।
आगे बढ़े तो एक चचा  झक्क सफ़ेद कुर्ते और टखने तक चढ़े पायजामे में,  शायद ताज़ी-ताज़ी नमाज़ अदा कर के चले आ रहे थे।
हमने जाने किस रौ में बगल पहुँचते ही    'हैप्पी होली मुबारक़ हो चचा!' बोल पड़े।

चचा भी शायद हम से ही मौजी थे।  गाड़ी पर हाथ रख दिये। हमें लगा कि बिना पहचान  मुबारक़बाद देना भारी पड़ गया बेटा आज।
चचा बोले 'ऐसे कैसे हैप्पी होली मुबारक़? इतना खाली-खाली?'

हम अवाक रह गए। समझ नही आ रहा था कि क्या जवाब दें।
चचा शायद उस भाव को समझ गए। बोले - 'बरखुरदार मुबारक़ तो तब हो जब आप तबियत से करें। गले लगने का रिवाज़ ख़तम तो नही हुआ आपकी  पीढ़ी में?'

हमें वाक़ई कुछ नही सूझ रहा था।

पर चचा आख़िर चचा थे, बाहें फैला कर बोले 'आइये गले लगिये छोटे मियां।'

हम फिर भी खड़े के खड़े। कई घण्टों की होली के बाद रंगों की दुकान बने हुए थे हम।  वो सभी रंग जिनका आजतक उच्चारण तक  करना नही  आता था वो सब सजे थे हमारे ही सीने पर। कैसे लग जाते गले, चचा की सारी सफ़ेदी जाती रहती।  फिर सकुचाते हुए बोले कि 'चचा हम जाने किन-किन रंगों में डूबे हैं, आपके कपड़े मैले हो जाएँगे।'

वो खिलखिला कर हँस दिये और बोले 'ये कपड़े आपकी दुआ और नीयत से ज़्यादा कीमती नहीं।'

'आइये छोटे मियां, कहाँ दुनियादारी में पड़े हैं। कपड़े तो कल धुल उठेंगे, आप जाने मिलें, न मिलें।  और फिर ये रंग कल कहाँ होंगे।'

हम खुशी-खुशी गाड़ी से उतरे  और तबियत से गले मिले।

फिर उन्होंने जाने क्या बुदबुदा कर कहा। पर उनकी वो आँखें बता रही थीं कि दुआएं ही दी होंगी।

उसके बाद अपने दोनों हाथों में हमारा हाथ लेकर गर्मजोशी से परिचय पूछा, फिर कुछ आशीर्वाद दिये।

चलते-चलते बोले -  'यहीं पास में घर है, चलिये;  चाय  तो पीते ही होंगे?' हमने देरी का हवाला देते हुए माफ़ी मांगी।
इजाज़त लेकर चलने को हुए तो कंधे पर हाथ रख कर बोले - 'बेटा, दिली खुशी हुई मिल कर। मेरी ज़िंदगी की पहली होली है जिसमें मेरे दामन पर रंग लगा, पर यकीन मानो बहुत अच्छा लगा।
बेटा, ये  एहसास बनाये रखना;  ये लखनऊ ज़िन्दा रखना;  ये  हिन्दोस्तां बचाये रखना।'

चचा तो बोलकर आगे बढ़ गए। जाने क्या काफ़ी भीतर छोड़ गए...

अरे हाँ, हैप्पी होली मुबारक़।

#HappyHoli
#Incredible_India