अब छतें जुड़ी हुई नहीं होतीं,
ना ही जुड़ते हैं दिल|
अब दरवाज़े ज़रूरत से ज़्यादा नहीं खुला करते,
ना ही खुल कर मिलते हैं दिल|
अब आँगन साझे नहीं हुआ करते,
ना ही साझी होती हैं मुस्कुराहटें|
अब दिक्कतें निजी मामला हो चली हैं,
और खुशियों में नाचना है पुरानी बातें|
... अब छतें जुडी हुई नहीं होतीं,
ना ही जुड़ पाते हैं दिल|
अब अचार छत पर नहीं सूखा करते,
ना इतवार को बालों को दिखाते हैं अब सूरज |
अब छुड़इय्या दे कर नहीं उड़ाई जातीं पतंगें
ना ही होती हैं ज़िरहें मोहल्लों में अब|
छतों पर अब बिस्तर नहीं लगा करते,
ना ही नालियाँ ढकी जाती हैं अब बारिश में|
अब छई-छप-छई के खेल नहीं हुआ करते,
ना ही ताश की बाजियाँ लगती हैं अब |
अब छतें जुडी हुई नहीं होतीं,
ना ही जुड़ पाते हैं दिल|
अब, अब, अब बस ज़िन्दा हैं मकां,
पर बाशिन्दे नहीं मिला करते,
अब वो पानी के बम्बों पर पड़ोसी नहीं मिला करते।
अब छतों पर कपड़े नहीं सूखते कड़क,
ना ही रिश्तों की गर्मजोशी ताज़ा होती है,
... अब छतें जुडी हुई नहीं होतीं,
ना ही जुड़ पाते हैं दिल|
अब पापड़ों लाइन नहीं लगा करती छतों पर
ना ही सुलझाता है अब कोई उलझा माँझा,
अब वो कानाफ़ूसी की कला भी दम तोड़ रही,
ना ही अब खबरें होती हैं छत पर साझा।
अब ना वो लोहरी की मूंगफली और ना तिल,
ना ही वो नयी फसल की ईख मिला करती है|
ना तो मोहल्ले भर की दादी के किस्से सुनने को,
और ना ही वो सबके दादू की सीख हुआ करती है|
...अब छतें जुडी हुई नहीं होतीं,
ना ही जुड़ पाते हैं दिल|
अब फ़ाटक ज़रा हौले से खुला करते हैं,
अब लोग नहीं पाते हैं मिल|
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