कम्पनी रूल : भाग -03
अब किसी के जाने से चूल्हा खुद तो जल नही उठता,
तो अपनों की मान-मनौव्वल पर अपने सेठ जी, यानी कि माता जी के बड़े बेटे, को कम्पनी का गल्ला संभालना पड़ा| लगभग सब कुछ सजा-सजाया था| उन्हें बस आकर बैठना
ही तो था| वो आये बैठे और फिर सब फिर से
ढर्रे पर आ गया| सेठ जी की धर्मपत्नी
चूँकि विलायत से थीं तो हिन्दी में हाथ
तंग था और इसी कारण से व्यापार के अंदरूनी मामलों में दखल
नहीं देती थीं| ठीक भी था, मालिक एक ही हो तो बेहतर| सेठ जी व्यापार में कुछ ऐसे जुटे कि कब दूसरों
की रोज़ी में सेंध लगा दी पता भी नहीं चला|
उनमे से एक से रहा नही गया और उसने सुपारी दे दी सेठ जी को जान से मारने की| सेठ जी की हत्या हो जाती है|
अब
सिर्फ़ परिवार ही नहीं व्यापार भी अनाथ हो चला| कुछ समय तक तो गद्दी इस मुलाज़िम से उस मुनीम तक चली, पर कोई ढंग से संभाल नहीं पाया| बड़े व्यापार के लिए कुल भी उच्च होना चाहिए, ये समझने में देर लगी उनको|
माता जी के पुराने वफ़ादार अब भी
जैसे-तैसे व्यापार की नाव खे रहे थे
| तब जा कर उन में से कुछ को सेठ जी की पत्नी, जो की वर्षो से निर्वासन में थीं, उनकी याद आई|
चूँकि उन्हें व्यापार का न कोई शऊर था ना ही तालीम मिली कोई, तो नावाकिफ़ थीं उसकी रवायतों से| खैर, किसी तरह उनको मना कर कम्पनी की बागडोर
उनको थमाई गयी| ये ठहरीं विलायती और कुछ
पुराने कर्मचारी थे जनेउधारी
ब्राहमण, जो किसी बाहरी का छुआ न
खाते थे न पीते थे, तो उन्होंने नौकरी छोड़
दी| गुज़ारा चलाने के लिए पास ही गुमटी खोल
ली, जिस से कुछ पुराने परिचित ग्राहक इधर
आ जायें तो दुकान चल सके| कुछ की चल भी पड़ी, कुछ गाँव लौट गए अपने|
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