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Sunday, 11 August 2019

कम्पनी रूल : भाग -03


कम्पनी रूल : भाग -03

अब किसी के जाने से चूल्हा खुद तो जल नही उठता, तो अपनों की मान-मनौव्वल पर अपने  सेठ जी,  यानी कि माता जी के बड़े बेटे,  को कम्पनी का  गल्ला संभालना पड़ा|  लगभग सब कुछ सजा-सजाया था| उन्हें बस आकर बैठना ही तो था|  वो आये बैठे और फिर सब फिर से ढर्रे पर आ गया|  सेठ जी की धर्मपत्नी चूँकि विलायत से थीं तो हिन्दी  में हाथ तंग था  और इसी  कारण से व्यापार के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देती थीं|  ठीक भी था,  मालिक एक ही हो तो बेहतर|  सेठ जी व्यापार में कुछ ऐसे जुटे कि कब दूसरों की रोज़ी में सेंध लगा दी पता भी नहीं चला|  उनमे से एक से रहा नही गया और उसने सुपारी दे दी सेठ जी को जान से मारने की|  सेठ जी की हत्या हो जाती है|

अब  सिर्फ़  परिवार ही नहीं  व्यापार भी अनाथ हो चला|  कुछ समय तक तो गद्दी इस मुलाज़िम  से उस मुनीम तक चली,  पर कोई  ढंग से संभाल नहीं पाया|  बड़े व्यापार के लिए कुल भी  उच्च होना चाहिए, ये समझने में देर लगी उनको| माता जी के पुराने  वफ़ादार अब भी जैसे-तैसे  व्यापार की नाव खे रहे थे |  तब जा कर उन में से कुछ  को   सेठ जी की पत्नी,  जो की वर्षो से निर्वासन में थीं,  उनकी याद आई|  चूँकि उन्हें व्यापार का न कोई शऊर था ना ही तालीम मिली कोई,  तो नावाकिफ़ थीं उसकी रवायतों से|  खैर, किसी तरह उनको मना कर कम्पनी की बागडोर उनको थमाई गयी|  ये ठहरीं विलायती और कुछ पुराने कर्मचारी थे जनेउधारी  ब्राहमण,  जो किसी बाहरी का छुआ न खाते थे न पीते थे, तो उन्होंने  नौकरी छोड़ दी|  गुज़ारा चलाने के लिए पास ही गुमटी खोल ली, जिस से कुछ  पुराने परिचित ग्राहक इधर आ जायें तो दुकान  चल सके|  कुछ की चल भी पड़ी, कुछ गाँव लौट गए अपने|

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