Labels

#BhaiyaSpeaks (51) #Hindi (17) #भईया_उवाच (15) #Kavita (11) #HindiKavita (9) Did I say that ? (9) Did I say that? (8) #हिंदीकविता (7) #हिन्दीकविता (6) #कविता (5) It happens!! (5) Poetry (5) Hindi Poetry (4) #Life (3) हिन्दी कविता (3) # (2) #ContemporaryIndia (2) #HindiPoems (2) #Hope (2) #आशा (2) #घास (2) #देश_आजकल (2) #भईया_उवाच #देश_आजकल #BhaiyaSpeaks (2) #माँ (2) #हिंदी (2) ‪#‎ViciousCalledLife‬ (2) #AAP (1) #Abuse (1) #AsianGames2014 (1) #Atheist (1) #Betrayal (1) #BhagatSingh (1) #CRPF (1) #Darkness (1) #DelhiElections (1) #Democracy (1) #Dreams (1) #DurgaPuja (1) #FarmerSuicide (1) #Gorakhpur #JapaneseEncephalitis (1) #Kejriwal (1) #Kolkata (1) #Light (1) #Molestation (1) #Navratri (1) #Pujo (1) #RatRace (1) #SukmaAttack (1) #Sun (1) #Time (1) #WhyIAmAnAtheist (1) #Youth (1) #एकाकी_जीवन (1) #कर्नाटक_चुनाव #KarnatakaElections2018 (1) #किताबघर #क़िस्से #हिन्दी #हिन्दी_कविता (1) #पापा #विदाई #श्रद्धांजलि (1) #प्रकाश (1) #मोहल्ला_संस्कृति (1) #रौशनी (1) #वक्त (1) #शाम (1) #शोर #ज़िन्दगी #Life #हिन्दी_कविता #हिन्दी #कविता (1) #सपने (1) #सपने #Dreams (1) #सर्वहारा (1) #स्त्री #स्त्री_विमर्श (1) #हिन्दी #हिन्दीकविता (1) #हिन्दी_कविता (1) Happy Holi (1) Incredible India (1) It happens (1) It happens¡ (1) Sunday (1) The forgotten art of #LetterWriting (1) अँधेरा (1) अवसरवादिता (1) इतवार (1) उत्तर प्रदेश चुनाव (1) कविता (1) चलो आज अपने पर खोलते हैं। (1) लोकतंत्र (1) हिन्दी (1) हैप्पी होली (1)

Sunday, 6 September 2015

अपने हिस्से की रौशनी

अपने हिस्से की रौशनी...

क्यूँ नहीं तोड़ लाते तुम वो रौशनी?

जो निस्संदेह तुम्हारे हिस्से की है !

हाँ ! तुम ही हो उसके हक़दार |

नहीं बात ये किसी मनगढ़ंत किस्से की है |

कब रहा है साथ ज़माना, पीछे छूटने वालों के ?

लगाओ दम, बढ़ो आगे,

करो सूरज को काबू |

उलाहना नहीं, इसे मेरी ललकार समझो !

बोओ सपनों के बीज,

सींचो उनको परिश्रम से,

डालो थोड़ी दृढ-प्रतिज्ञ सी खाद,

और फिर, बढ़ने दो...

बढ़ने दो, और भी बढ़ने दो...

इस पौधे को, सपने के ,

अपने |

तपने दो !

बढ़ने दो |

मंझने दो |

होने दो थोडा और भी मज़बूत...

पहुँचने दो, सूरज तक |

छोड़ इस अनचाहे अँधेरे को पीछे,

एकटक देखो इस रौशनी को ;

घूरते रहो ! उसके अन्दर तक |

इस रौशनी को,

जो शायद है बैठी,

किसी योग्य विजेता की मूक प्रतीक्षा में,

अपलक ...

वो, जो वर्षों, दशकों और शायद सदियों से,

भोग रहे हैं, उसे;

तुम्हारे पसीने से पनपे ,

उस पेड़ की डाल पर बैठने वाले;

उस पर अधिकार जमा,

उस रौशनी को घूरने वाले;

उस को अपनी नीची निगाहों से गन्दा करने वाले;

अपनी उन मंशाओं से उसका चीर-हरण करने वाले;

उसका मोल ना जान भी उसका दाम लगाने वाले;

उसे अपनी पटरानी समझ कहीं भी दिखावा करने वाले;

उस अनार्जित कीर्ति को अपमानित करने वाले
;
उस अलौकिक वैभव को निज संपत्ति समझने वाले;

और ना जाने किन-किन तरीकों से उसका तिरस्कार करने वालों से...

क्या बचाना ना होगा उस रौशनी को ?

मैं तो तोड़ के लाऊंगा,

अपने हिस्से की रौशनी !

और तुम ?

Monday, 10 August 2015

~बारिश~



ना   जाने कितने  चेहरे  धुले  होंगे,

ना  जाने कितने  मुखौटे  उतरे  होंगे;

इस  बारिश में ।।

ना  जाने  कितने  ख्वाब  जागे होंगे,

ना  जाने  कितने  सपने  टूटे  होंगे,

इस बारिश में ।।

ना  जाने  कितनी  बांछें  खिली  होंगी,

ना  जाने  कितने  माथे  सिकुड़े  होंगे,

इस बारिश  में ।।

ना  जाने  कितनी कागज़ की  नावें  तैरी  होंगी,


ना  जाने  कितने  जहाज़ डूबे होंगे;

इस बारिश  में ।।

ना  जाने  कितनी  ऊँचाइयाँ  किसी ने  छुयी होंगी,

ना  जाने  कितनी  पगड़ियाँ  उछली  होंगी;

इस बारिश  में ।।

ना  जाने  कितनी  नींव  पड़ी होंगी,

ना  जाने  कितने  झोपड़े ढहे  होंगे;

इस बारिश  में ।।

ना  जाने  कितनी  आँखें  चमकी  होंगी,

ना  जाने  कितनी   आँखें  बुझी  होंगी;

इस बारिश  में ।।

ना  जाने  कितनी  कलाइयाँ  मुड़ी  होंगी,

ना  जाने  कितनी चूड़ियाँ  टूटी  होंगी;

इस बारिश  में ।।

ना  जाने  कितने  मंसूबे बंधे  होंगे,

ना  जाने  कितनी  हिम्मतें  टूटी  होंगी;

इस बारिश  में ।।

ना  जाने  कितने  कलमे किसी ने पढ़े होंगे,

ना  जाने  कितनी  मिन्नतें किसी  ने की  होंगी;

इस बारिश  में ।।

ना  जाने  कितनी  बाढें  आई  होंगी  कोसी  में,

ना  जाने  कितने   विदर्भ  सूखे  होंगे;

...   इसी बारिश  में ।।

#भईया_उवाच
#BhaiyaSpeaks
#बारिश
#Destiny
#TheViciousCalledLife

Tuesday, 4 August 2015

~मिलूँगा मैं...~

पूनम की झिलमिल  रौशनी में नही,

मिलूँगा  मैं अमावस की चादर के अन्दर !

उस चिर-प्रतीक्षित स्वाति  नक्षत्र    में नही,

मिलूँगा मैं  उस  भयंकर  सूखे  की  बेला  में !

उस  नव-पल्लवित  फुलवारी  के  बीच  नहीं,

मिलूँगा मैं उस  बियाँबान  मरुस्थल  के  रेत  के  टीलों  के बीच !

उस नए  खड़े  मॉल  की  एलीवेटर के घूमते  पट्टों  के सहारे  टिक कर  नहीं,

मिलूँगा मैं उस  अन्जान,  स्याह  सड़क  पर !

शरद  की  उस  पहली  ओस  पर चलते हुए नहीं,

मिलूँगा  मैं उस तपती  अकेली राह  पर !

चकमक  करती  इस  जगमगाहट में नहीं,

मिलूँगा मैं उस   दोराहे  के   बंद, निराश मुहाने  पर !

उन  तालियों की गड़गड़ाहट के बीच नहीं,

मिलूँगा  मैं उस  नितांत अकेले पल में !

उन  रुबाइयों, कव्वालियों, गीतों  और विलास  में नहीं,

मिलूँगा  मैं  अंतर्द्वंद्वों और  संशयों के  क्षण  में !

उन  उत्त्तेजित करती  और  दंभ  भरती सराहनाओं  के बीच नहीं,

मिलूँगा  मैं उस  वास्तविक विडंबनाओं  के करीब !

उन सफताओं की  अट्टालिकाओं  पे चढ़  चिल्लाता  हुआ नहीं,

मिलूँगा मैं  उस जीवन समर  के  जूझते  पल में !

... तुमसे !!

क्यूंकि,

तब  तुम ,  तुम  होगे ।

बस तुम !

और  मैं,

... हम !!

#भईया_उवाच
#BhaiyaSpeaks
#हम

Thursday, 9 July 2015

तुम लिखो सावन और चढ़ते यौवन के बारे में !!


तुम  लिखो  सावन और  चढ़ते  यौवन के बारे में,
हम तो  सूखे और खोते  बचपन की ही सुध लेंगे |
                तुम रहो करते महिमामंडित अग्नि और सूर्य  को,
हम तो अंधेरों से ही अपनी राह निकालेंगे |
      तुम करते रहो उस हरियाली का  यशगान,
हम तो बंजर के  साथ  रह,  उसे  सम्हालेंगे |
      तुम गिन-गिन कर खुश हो लो अट्टालिकाओं की सीढियां,
हम तो उनके कमरों की दरी में अपने जवाब तलाशेंगे |
      तुम  करो अभिषिक्त उस नए दिन के उजाले को,
हम इन स्याह  रातों को  अपना प्रकाश-स्तम्भ  बना लेंगे |
      तुम  बन कृपा पात्र हर सुख का रसपान  करो,
हम विषमता के गरल को हँस के  गले  उतारेंगे |
      तुम रहो चूर मद में उनकी  उधार  की सफलताओं के,
हम दे साथ  संघर्षों  का, उनकी नाव पार लगावेंगे |
      तुम रहो जकड़े,  पकडे,  उन आशाओं की पूंछ,
हम निराशा को धकेल पीछे,  सूरज नए उगा लेंगे |
      तुम ख़ुशी  से भटको उन मखमली गलियारों में,
हम भरसक  इन  कंटीली वास्तविकताओं को  सम्हालेंगे |
      तुम नहाओ विदेशी मदिरा में,  करो  व्यसन,
हम इस मुफ्त चांपाकल से
अपनी प्यास बुझा लेंगे |
तुम करो स्थापित उनकी नयी  चतुराई  को,
हम इनकी  सरलता में खुद को पा लेंगे |
हो  तुम्हे गर्व उनकी उस  सतत्  ऊँचाई  पर,
हम इनकी सतह  के  किस्सों में गोते खा लेंगे |
वो बढें,  तुम  फलो-फूलो, यही  चलता रहे,
हम इनको जिंदा रखने में जान लगा देंगे |
तुम बने रहो चमक-दमक के साथी,
हम दियों  की रौशनी में इन्हें जीना  सिखा लेंगे |
तुम  लिखो  सावन और  चढ़ते  यौवन के बारे में,
हम तो  सूखे और खोते  बचपन की ही सुध लेंगे |



* सिर्फ़ , एक और...*

* सिर्फ़ , एक और...*

बड़े ही बेकल से थे,
वो दोनों ...
दोनों ही के ज़ेहन में थी,
बस एक ही ख्वाहिश,
'सिर्फ एक और'...
बहुत ही शिद्दत से थी तलाश,
उन दोनों को,
उस शख्स़ की,
... उस साथ की;
... या शायद उस एहसास की?
दोनों मिले,
रूहों का रिश्ता सा बना,
एक शून्य सा था,
जो भरा उसके आने से ।
... और एक खालीपन सा था ,
जो दूर हुआ इसके आने से ।
दिन गुज़रे,
बदला मौसम,
खुली कुछ धुप,
उतरने को हुए मुखौटे...
इसके लिए वो 'सिर्फ' निकला...
और ;
उसके लिए वो बस 'एक और'...

'‪‎माँ‬'

आज फिर माँ बोली -
"अपने हाथ से खाओ ना,
कब बड़े होगे ?"
आज फिर चूल्हे में माँ का हाथ जला होगा ।।

स्याह रातें

रातें स्याह ज़रूर ही होती हैं,
और रहेंगी ।
पर अँधेरी भी हों या ना हों,
ये सोचा जा सकता है ।।

ये मुल्क मेरा


बचाती फ़िरती है अपनी अस्मत वो कमसिन हर रोज़;
दम भरते हैं वो कि मेरे मुल्क में मर्द बहुत हैं ।।

चन्द सिक्कों में बिकते देखे ईमान यहाँ फुरसत से,
गुज़रते नुक्कड़ से सुना कि मेरे मुल्क में महंगाई बहुत है ।।

बहुत हंसती है उस शहीद फौजी की बूढी माँ,
सुनते हैं कि उसके दिल में दफ़्न दर्द बहुत है ।।

'हक़'

'हक़'

मैं तो छोटा हूँ ,
मेरा ज़्यादा हक़ है;
बी. पी. और भागदौड़,
ले लिए हैं,
मैंने !!
बाकी जो भी मिलता हो,
माँ से ,

देख लो तुम लोग,
आपस में!
किसी शांत मन की अशांति
और किसी उद्वेलित ह्रदय की शांत हो पाने की उत्कंठा,
ये दोनों ही परस्पर प्रतियोगी
और तुलनीय होती हैं;
... कभी आज़मा के देखिये साहिब !!

Saturday, 30 May 2015

झूठे

अनमने से हो,
फिर भी मुस्कुरा रहे हो,
सच बोलो,
क्या अब तक रूठे हो?
देखा !!
बोला था ना,
कि वाकयी,
मुझसे बड़े झूठे हो!!

सूखी दूब

दूर कहीं ...
इक ओस की बूँद देख ...
सोचा कुछ राहत होगी,
पहुंची पास,
तो देखा कि,
स्पर्श मात्र से,
खो दिया अस्तित्व अपना,
'उसने भी'...
~ शोकाकुल,
सूखी दूब

~सोन पापड़ी~ (भाग-2)


आज फिर लंच हुआ,

निपटाया खाना भी,

फिर बारी आई,

सोन पापड़ी की,

दोबारा !

आज फिर वही नरमी,

वही मिठास,

वही स्वाद,

जैसे तैयार सी थी वो,

एक दम से बिखर जाने को...
और फिर तभी हुआ,

एक बोध,

एक परिचय वास्तविकता से,

जीवन की,

कि ये सोन पापड़ी,

भले ही याद दिला जाती हो,

बरबस ही तुम्हारी,

पर ये बराबरी तो नहीं ही कर सकती,

तुम्हारी;

अरे, ये रोज़ मिल जो जाती है...

बस इसलिए!!

~ सोन पापड़ी ~


अरे, सुनो !
अभी लंच था ना,
तो उसके बाद,
मन हुआ कि कुछ मीठा हो जाये,
तो फाइनली,
सोन पापड़ी पे जा के टिके,
यहाँ, ऑफिस के बेसमेंट में एक दुकान है,
सिगरेट की,
ना-ना, दोबारा शुरू नहीं की भाई,
बस रेफरेंस दे रहा था यार...
अच्छा सुनो,
तो बस वही चेला अपना रखता है ,
पैकेट्स, सोन पापड़ी के भी।
सही थी, ट्रस्ट मी !
नर्म, हल्की मीठी और
पिस्ते की टॉपिंग के साथ...
बस जैसे ही काटने को चलो,
भरभरा के अलग -थलग...
बिखरने सी लगती है;
मग़र,
सच मानो, आनंद आ गया !
और,
बरबस ही आ गयी,
तुम्हारी याद भी,
कुछ ऐसी ही तो हो ना,
तुम भी !!

~ All for him!! ~


'Ethics and family values' was his favorite topic.
He had already delivered 450+ lectures on this.
As he was reaching his 500th one,
his old frail father was still waiting in the old age home in his home town, somewhere in Kerala.
He was basking in the glory of applauses he was being showered with at this special ceremony at this 5-star in Mumbai;
Thousands of hands were in the air,
Full of praises and appreciastion,
And,
Full of life,
All for him !
Meanwhile, his cell phone, that was on silent mode, as per his own 'set of rules',
was flashing a weak beam denoting 48th missed call,
All from the same old age home!
Now the corpse of his father was in the Municipality Mortuary.
Where 'it', along with his attendant had been waiting for the well-bred son,
Since morning!
The morning since when he had been busy,
Busy, preparing to deliver a lecture on 'Deteriorating Levels of Ethics and Morality' (with emphasis on care for the old age Parents)!
Here, in his home town, his own father died a silent death!
His hands, too, were extended, yet,
With handful of expectations, (pertaining to last rites only, probably)
But, with no life, now,
Yet again,
'All for him!!'

Reminiscence

Cherishing the memories of subtle smiles is prettier than the plans of loud laughter at times!!

Instincts

Instincts are no less important than any tangible organ...
Either put them to their optimum use or they shall begin to fail you;
or disappear, at all, like your erstwhile tail.

ढिबरी

रौशनी देने के लिए बनी ढिबरी पर कुछ तो कालिख ज़रूर ही रह जाती होगी,
भले ही कितनी ही अनमनी सी क्यूँ ना हो, 'वो ढिबरी'!

एहसास

जी लेना चाहता हूँ,
इन साँसों को भूल कर,
उन सर्द शामों को;
और उन रातों को,
जो गर्म सी थीं ,
मेरे आंसुओं से नहीं,
एहसास से,
तुम्हारे!

आखिर क्यों?

दफ़्न कर क्यूँ ना दूँ,
हर उस शख्स़ को,
जिसने पहला हाथ था बढाया,
उस मुस्कान के साथ,
जो झूठी थी, असल में;
जिसने थामा था,
मेरी थकी हुई उँगलियों को,
सहारा देने के लिए,
मक़सद सहारा देना था,
या कि पाना,
खुदा मालिक !
पर क्यूँ भला जगा गए,
जो कि सो चुका था,
मुझमें,
उस इंसान को,
मुस्कान दे के अपनी ?
आखिर क्यूँ ?

तुम सूर्य बनो!

ढूँढने वाले ढूंढ ही लेंगे,
छाया;
तुम सूर्य बनो!
पूजा उसी की होती है,
आदि काल से !!

~ "आविर्भाव" ~


साँसों की मधुमय धुन पर, पलकों की सरसराहट से,
गुंजा देती हो तुम, उस भाव को, जो निर्द्वन्द्व सोया है,
जाने कब से, किसी अज्ञात से कोने में !
तुम मैं हो, या मैं तुम हूँ? ज़रा बतलाओ...
हो बालसखी ; या कि प्रिय तुम, यौवन का सद्वन्द्व मिलन?
उस चंचल, निश्छल विचरण में, कर-कमलों के उस बरबस बंधन में ;
तुमने किया था तृप्त मुझे? या कि था वो कोई दिवास्वप्न?
है अवश्य कुछ, बस जानो इतना !
हाँ, ज़रा बतलाओ, कह सकता हूँ ना 'प्रिय' तुमको?
ना और सम्बोधन कोई सूझा मुझको;
है बस कुछ साझा सा अपने बीच,
जो लाता है मुझको खींच,
ना ! तुम तक नहीं !
पर उस भाव तक अवश्य ही,
जो है उत्पन्न हुआ तुम्हारे आविर्भाव से ही !
अच्छा छोड़ो !
जाने भी दो;
बस ये बतला देना, जब वक़्त मिले,
क्या सचमुच ही, पहुँच सका कभी तुम तक भी,
वो भाव ?

‪#‎BhaiyaSpeaks‬

उस ठूंठ से तने सा सूखा खड़ा था, अनमना सा;
उनकी नज़दीकी ने जैसे कई सावन ला दिए ,।।

‎माँ‬

उस नौ गज़ की साड़ी के आधे एम्-एम् (0.5 mm.) के तले महफूज़ सा था ,
आज तो नाईन एम्-एम् (9 mm.) के घेरे में सांस भी उधार की लगती है !
इन स्याह रातों को उजला कर ले कुछ कर,
तेरा दिन भी बदलेगा और दीन भी !!

पेड़ नहीं तुम सूर्य बनो !!




पेड़  नहीं तुम  सूर्य   बनो,

ढूँढने  वाले ढूंढ ही लेंगे, 

छाया !

तुम बनो संबल उनका,

जिनको है आवश्यकता  तुम्हारी,

तुम्हारी संचित ऊर्जा  की,

तुम्हारी अविरल  ज्वाला  की,

तुम्हारी  प्राणदायिनी  शक्ति की,

और,

तुम्हारी उस प्रेरणा की,

जो  हर सुबह के साथ,

पुनर्जीवित कर जाती  है,

अनेकों  आशाओं  और संभावनाओं को,

पुनश्च !

और,

दे  जाती है एक जिजीविषा,

इस  अथाह  धरती  के,  हर कोने में बैठे,

छुपे,  ऊंघते,  सोते,  पड़े

हर उस  जैव-अजैव   तत्व  को !

तुम्हारी  महत्ता  उसी  में है,

और तुम्हारे अस्तित्व का  अर्थ भी,

और,  मोल  भी !


छाया का क्या  है,

निरी माया है !

जब जिसे चाहिए  होगी,

पा ही  लेगा,

कुछ भी कर...

एक  ओट  पाकर,

या  फिर, 


सिर  झुका  कर... !!

Friday, 1 May 2015

भिखारी कौन ?


रईस  और  किस्मतवाला  लगा,

उस  मंदिर  के  बाहर ,

बैठा  हुआ  वो   भिखारी,

जिसकी  भूख  भी कम थी,

पर  पहुँच  बड़ी।

दो  चार  या  दस  से ज़्यादा,

भूख  नहीं  थी  उसकी,

और  पहुँच  इतनी  कि,

बिना  अन्दर  गए  भी ,

हो  जाती थी पूरी,

उसकी  मन्नत।

और  बाकी दुनिया,

जो  सज  धज  के,

गुल-इत्र  लगा  के ,

पहुचती  थी  द्वार पे  मंदिर  के,

इस  भिखारी  को ,

नज़रंदाज़  करने  की  भरसक  कोशिश   करके,

और  आखिरकार,

झुंझला  के  ही  सही,

दे  ही  देती ,

दो चार  या  दस  रुपये,

और  पूरी  कर  देती ,

उसकी  मन्नत,

जो  सीमित  थी ,

अगले  वक़्त  की  भूख  तक।

... और  ऐसा  कर  वो  मान   लेती शायद,

कि  ये  दो  चार   या  दस  रुपये,

काम  करेंगे   सिफारिश  का,

मंदिर  के  अन्दर,

जब वो  खुद  झुक कर,

मांग  रही  होगी,

तमाम   मन्नतें,

उस  मंदिर  के  भीतर,

खुद  भिखारी  बन!!

#Beggary
#IronyOfLife

Thursday, 23 April 2015

कैसा मेरा देश ?

किसी   हाई-वे  की  उड़ती  धूल  सा,
        या कि  उसके  डिवाइडर  पे  बेमन   से  उगाये गए पौधों  सा,
पास  के  सोते  (स्रोत) पे मंडराते  पक्षी  सा,
        या कि  रात के  अँधेरे में  चाय  तलाशते   विद्यार्थी  सा,
सड़क पे बिछाए  जुगनुओं  के जाल सा,
        या कि   मन में कौंध रहे अनगिनत प्रश्नों के जंजाल सा,
उसी  हाई-वे  के किनारे  बसे किसी खानाबदोश ‘खानदानी हकीम’ सा,
        या कि पान-मसाला  औ   गुटखा बेचते उस परिचित से  बूढ़े सा,
चिलचिलाती धुप में पानी तलाशते उस ट्रक ड्राईवर सा,
        या कि बी.एम्. डब्ल्यू.  किनारे लगा के दिन में ही पेग  बनाते उस
‘डिप्रेस्ड’ रईसजादे सा,
भूख से बिलबिलाते उस नवजात सा,
        या कि उस नवयौवना  के दुर्भाग्यपूर्ण  गर्भपात सा,
बाल और दाढ़ी  बढ़ाये उस ढोंगी सा,
        या कि अपना जीवन न्योछावर कर अगली पीढ़ी  का संवारते उस योगी सा,
‘सीमित साधनों’  में आदर्शों को  ढोते उस शिक्षक  सा,
        या कि  पेपर लीक कर, हवेली  खड़ी  करते उस परीक्षक सा,
मिसाईलों  पर गर्व करते  उस अल्पज्ञ   नवयुवक  सा,
        या कि उसका अर्थ तक ना समझते उस रिक्शा-चालक सा,
ज़मीनी  मुद्दों को दरकिनार कर के भी एजेंडा खड़ा कर सकने वाले स्वयंभू नेताओं सा,
        या कि  उनके सामने  असहाय  से खड़े, फांसी लगाते युवाओं सा...?
क्या?  आखिर क्या है मेरा देश?
        ये सब,  और ऐसा ही बहुत कुछ...
या कि वो जो हमें  परोसा जाता है रोज़,
       365 चैनेलों  द्वारा, लिविंग रूम की  बड़ी सी L C D Screen  पर,  रोज़?

#भईया_उवाच
#BhaiyaSpeaks
#FarmerSuicide
#BharatDurdasha