रईस और किस्मतवाला लगा,
उस मंदिर के बाहर ,
बैठा हुआ वो भिखारी,
जिसकी भूख भी कम थी,
पर पहुँच बड़ी।
दो चार या दस से ज़्यादा,
भूख नहीं थी उसकी,
और पहुँच इतनी कि,
बिना अन्दर गए भी ,
हो जाती थी पूरी,
उसकी मन्नत।
और बाकी दुनिया,
जो सज धज के,
गुल-इत्र लगा के ,
पहुचती थी द्वार पे मंदिर के,
इस भिखारी को ,
नज़रंदाज़ करने की भरसक कोशिश करके,
और आखिरकार,
झुंझला के ही सही,
दे ही देती ,
दो चार या दस रुपये,
और पूरी कर देती ,
उसकी मन्नत,
जो सीमित थी ,
अगले वक़्त की भूख तक।
... और ऐसा कर वो मान लेती शायद,
कि ये दो चार या दस रुपये,
काम करेंगे सिफारिश का,
मंदिर के अन्दर,
जब वो खुद झुक कर,
मांग रही होगी,
तमाम मन्नतें,
उस मंदिर के भीतर,
खुद भिखारी बन!!
#Beggary
#IronyOfLife