"ये मेरे पापा हैं, तुम्हारे पापा तो मर गये|" यह बोल कर हम ज्ञानू को पापा के पास सोने से मना कर देते थे| फिर हम खुद कब सो जाते थे याद नहीं|
फिर शायद मम्मी या दादी आकर उन्हें ले जाती थीं, या जो भी होता रहा हो, हमें न याद है न ही कोई चिंता थी उस वक़्त||हम कुल जमा पाँच या छः साल के रहे होंगे, जबका ये वाक़या है|पापा हर एक-दो महीने में आते, दो-तीन दिन हम लोगों के साथ रहते और फिर प्रतापगढ़ वापस चले जाते थे|पापा पेशे से वकील थे| उच्च न्यायलय के काम से लखनऊ आते रहते थे| ऐसा कभी नहीं हुआ कि वो बिना मिठाई लिए आये हों, या फिर जाते वक़्त हम लोगों को को बिना कुछ 'विदाई' दिए गए हों|
इसमें उनका ज्येष्ठ पुत्र-मोह साफ़ दीखता था, मोनू को अगर बीस मिलते थे तो हमें पाँच या फिर अगर पचास का नोट उनको दिया गया तो हमारे हिस्से साढ़े सोलह ना आकर, फिर भी पाँच ही रुपये आते थे| चूँकि हम छोटे थे तो 'तुम्हें काम ही क्या है?' या फिर 'पापा हमको बोल कर गए हैं कि उसको पाँच रुपये उसको दे देना' ऐसा कुछ ज्ञान देकर चुप करा दिया जाता था। अब आज की तरह तब मोबाइल फोन तो थे नहीं की बटन दबाये और जासूसी कर ली, तब लैंडलाइन फ़ोन का ज़माना था और प्रतापगढ़ में तब तक फ़ोन नहीं लगा था|और इसका फायदा मोनू ने काफ़ी सालों तक उठाया| हमें फ़र्क नहीं पड़ा कभी कि उन्हें क्या मिला या ज़्यादा क्यूँ मिला, हम तो अपनी उस पाँच रुपये की 'जागीर' में मगन रहते थे| चुपचाप उसे जेब में रखे रहते, सोते वक़्त भी वो 'पाँच रुपये की जागीर' या तो जेब में रहती या फिर उस बिस्तर के नीचे, जिस पर हम सोते थे|स्कूल जाते वक़्त बाक़ायदा उसको ठिकाने लगा के जाते थे और स्कूल से वापस आने पर सबसे पहले उसकी पड़ताल होती थी कि भैया अपनी पूँजी सुरक्षित तो है न| हम कुल जमा 8-10 साल के रहे होंगे|
हम छोटे ही थे।
एक बार पापा किसी दोस्त के साथ लखनऊ आये तो हम काफ़ी देर तक उनके इर्द-गिर्द ही मंडरा रहे थे।
उन्होंने पापा से कहा कि इन्हें कुछ कहना है या तो कुछ काम है, पापा का जवाब था कि 'ये छोटे हैं, तो सबसे ज़्यादा लगाव इन्हीं को है।'
वो मित्रवर चुप हो गये।
हम कुछ 12-13 साल के रहे होंगे। छोटे ही थे।
हम दसवीं में थे और ठीक-ठाक नंबर लाये, तो पापा सब को गर्व से बताते कि बहुत मेहनती है और होशियार भी।
वो अलग बात है कि असलियत इसके उलट थी।
हम 16 साल के थे, छोटे ही थे।
उसके बाद बारहवीं के परिणाम आया और नम्बर फिर ठीक थे तो वो खुश दिखे।
हमें दिल्ली जाना था, सबके विचार अक्कड़-बक्कड़ खेल रहे थे, पर पापा ने कहा कि 'तुम्हें ठीक लगता है तो ज़रूर जाओ।'
हम 18 के हो गये थे, पर छोटे ही थे।
मिठाई और विदाई का सिलसिला रुका नही था अब भी।
फिर हमने अपने विश्वविद्यालय में चुनाव लड़े। जीते भी।
और ये सब चुपके से करना पड़ा था, वरना घर से निकाले जाने की पूरी संभावना थी।
पर जब उन्हें जीत का पता चला तो सबको ऐसे बताते थे मानो हम एक संकाय (Faculty) का चुनाव न जीते हों बल्कि राष्ट्रपति चुने गए हों। वो दर्प, वो आँखों में चमक और आवाज़ में खनक।
हम लगभग 20 साल के थे, पर छोटे ही थे।
फिर उनके कदमों पे चलते हुए हमने भी एल. एल. बी. की पढ़ाई करी, वो उस से भी खुश लगते थे कि चलो अगली पीढ़ी में एक और वकील है परिवार में।
हम लगभग 24 के थे, पर पापा के लिए छोटे ही रहे होंगे।
फिर भी उनका आने-जाने का सिलसिला, मिठाई और विदाई का दौर रुका।
फिर 2008 में हमारा लखनऊ छूट गया।। हम दिल्ली चले गये, उसके बाद उत्तराखण्ड और फिलहाल ओडिशा।
लेकिन पापा ने लखनऊ आने का रिवाज़ और हमारी चिन्ता नही छोड़ी। फ़ोन पर खोज-खबर रखते और आने-जाने की पूरी जानकारी भी।
जब भी हमें लखनऊ आना होता तो बोलते कि 'बताना जब आना हो, हो सकता है कि हम भी आयें उस बीच।' फिर ये सिलसिला धीरे-धीरे काम होता गया।
मुलाकातें बस शादियों वगैरह तक सीमित हो गयीं।
पिछली बार अपनी ही शादी में मिल पाये थे, 2016 में।
दो साल... जिन पापा से छोटे होने पर लगभग हर दूसरे महीने मिल ही लेते थे, उनसे मिले दो साल से अधिक हो गये।
आज उनका जन्मदिन है।
इनके बाद हमारा आया करता था।
हम भले ही उनके जन्मदिन पर उन्हें कॉल करना भूल जायें, पर उनका फ़ोन सुबह-सुबह आ ही जाता था कि 'भाई, आज तो 4 जनवरी है। हमने कहा बधाई दे दें।'
'किस क्लास में आ गये' से शुरू हुआ वो सिलसिला 'कब आना है अब' तक बिना रुकावट चलता रहा।
बस अब शायद वो कॉल न आये।
पापा रहे जो नहीं।
वो पापा जो प्रतापगढ़ और बाकी दुनिया से हमारा परिचय थे। वो जो एक तने से थे, हम नन्ही कोपलों और हमारी जड़ों के बीच। पापा, जिनको अपनी 7-10 पीढ़ियाँ तो ज़ुबानी याद थीं। जो हमें बैसाने का इतिहास और उसके किस्से बातों-बातों में सुना दिया करते थे।
जो परिवार के रिश्तेदारों, पुराने दोस्तों और जानकारों से हमें मिलवाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे, अब खुद नही मिलेंगे।
फ़ोन पर जब खबर मिली तो विश्वास नहीं हुआ।
एक व्यक्ति जो बचपन से आपको लगभग हीरो सा दिखा हो, जिसने सारे सुख-दुःख, अच्छे-बुरे दिन उसी सम्यक भाव से काटे हों, जो किसी मौके पर खड़े होने से चूकता न हो, वह ऐसे छोड़ कर कैसे जा सकता है। पापा ऐसा कैसे कर सकते हैं। वो भी बिना बताये?
हम तो सबसे छोटे थे न, मिल कर तो जाते?
मिठाई तो खिलाकर जाते...
और विदाई???