उपसंहार !!
वो दबी थी,
निस्संदेह कुचली भी,
खुशियाँ उसकी ना हुई,
मुस्कान कहीं खोई थी,
वो तो बस थमी थी,
क्या उसमे ही कोई कमी थी?
हाँ, आँखों में कुछ नमी थी... और शायद वो सहमी थी,
किस्मत के मत्थे ही तो शायद वो पड़ी थी,
पर अब भी वो कहीं दूर मुस्कुराती खड़ी थी,
चुटकी भर सिन्दूर से लाल रंग बिखरा,
पर काले का तो परिचय भी न हो सका,
‘हाँ’ से लिखी थी जीवन की रूप रेखा,
‘जी अच्छा’ से पटी पड़ी थी प्रस्तावना,
और पुनश्च, ‘हाँ’ से ही होता था उपसंहार,
संवाद लिखे थे रूढ़ियों से,
पटकथा थी परम्पराओं से भरी पड़ी,
व्यंग्य से कुंडली का होता था श्री गणेश,
और कटाक्षों से ही हो पाती थी इतिश्री,
भूल सी चुकी थी वो शायद अपने को,
खो चुकी थी वो ‘हम’ के ‘अहम’ में कहीं,
और शायद ललक भी बाकी नहीं रही अब,
‘खुद’ को ‘हम’ में ढालते हुए, ‘मैं’ को पाने की...
क्या कुछ नहीं लिखा,
क्या क्या नहीं कहा,
निस्संदेह कुचली भी,
खुशियाँ उसकी ना हुई,
मुस्कान कहीं खोई थी,
वो तो बस थमी थी,
क्या उसमे ही कोई कमी थी?
हाँ, आँखों में कुछ नमी थी... और शायद वो सहमी थी,
किस्मत के मत्थे ही तो शायद वो पड़ी थी,
पर अब भी वो कहीं दूर मुस्कुराती खड़ी थी,
चुटकी भर सिन्दूर से लाल रंग बिखरा,
पर काले का तो परिचय भी न हो सका,
‘हाँ’ से लिखी थी जीवन की रूप रेखा,
‘जी अच्छा’ से पटी पड़ी थी प्रस्तावना,
और पुनश्च, ‘हाँ’ से ही होता था उपसंहार,
संवाद लिखे थे रूढ़ियों से,
पटकथा थी परम्पराओं से भरी पड़ी,
व्यंग्य से कुंडली का होता था श्री गणेश,
और कटाक्षों से ही हो पाती थी इतिश्री,
भूल सी चुकी थी वो शायद अपने को,
खो चुकी थी वो ‘हम’ के ‘अहम’ में कहीं,
और शायद ललक भी बाकी नहीं रही अब,
‘खुद’ को ‘हम’ में ढालते हुए, ‘मैं’ को पाने की...
क्या कुछ नहीं लिखा,
क्या क्या नहीं कहा,
माँ का हाथ बटाती,
थोड़ी सी सहमी पिता से,
एक नयी सुबह की मूक प्रतीक्षा में,
अपनी ही सी एक सृष्टि के सृजन में,
क्यूँ...?
क्योंकि वह अब एक बेटी थी!!
सारे हुक्म मानती,
खुलने ना देती कोई भी राज़,
करती साल भर एक रक्षा-बंधन का इंतज़ार,
सब समझती,
पर कुछ न कहती,
क्यूँ...?
क्योंकि अब वह एक बहन थी!!
थोड़ी सी सहमी पिता से,
एक नयी सुबह की मूक प्रतीक्षा में,
अपनी ही सी एक सृष्टि के सृजन में,
क्यूँ...?
क्योंकि वह अब एक बेटी थी!!
सारे हुक्म मानती,
खुलने ना देती कोई भी राज़,
करती साल भर एक रक्षा-बंधन का इंतज़ार,
सब समझती,
पर कुछ न कहती,
क्यूँ...?
क्योंकि अब वह एक बहन थी!!
सब ‘अपनों’ को छोड़ के आई, बिना उफ़ किये,
अपना सर्वस्व निछावर कर नयों को पूर्णतया अपनाया,
सतत करवा चौथ की प्रतीक्षा में,
सब कुछ सहती,
पर कुछ न कहती,
क्यूँ...??
क्योंकि अब वह एक पत्नी थी!!
अपनी छाती से प्यार ही प्यार उड़ेलती,
चौथ और डाला छठ का व्रत रखती,
आंसू पोछने में कम न पड़ता आँचल का विस्तार,
सब कुछ देखती - समझती,
पर कुछ न कहती,
क्यूँ...??
क्योंकि अब वह एक माँ थी!!
क्योंकि अब वह एक पत्नी थी!!
अपनी छाती से प्यार ही प्यार उड़ेलती,
चौथ और डाला छठ का व्रत रखती,
आंसू पोछने में कम न पड़ता आँचल का विस्तार,
सब कुछ देखती - समझती,
पर कुछ न कहती,
क्यूँ...??
क्योंकि अब वह एक माँ थी!!
क्या नियति ने किया नियत ये,
एक स्वच्छंद आत्मा के चार प्रहार,
चारों ही कुछ ठहरे से हैं!!
क्या कमी थी स्नेह में ?
या रह गयी कमी उसके प्यार में ?
कम पड़ गया उसका समर्पण या फिर ?
आँचल पड़ गया छोटा दुलार का ?
कमी उसके हिस्से के प्यार में,
कमी जीवन के रंगों में,
कमी थोड़ी सी खुशियों में,
कमी उसके विस्तार में,
कम सी पड़ती वो मुस्कान, और
कुछ कम ही व्यक्त हो पाती वो सहृदय भावनाएं...
एक ही रंग की भोगिनी थी वह,
ना साहस कम पड़ता, और
ना ही विश्वास..
तो क्यूँ... क्यूँ ‘हाँ’ ही ‘हाँ’ की रट लगाती,
वो इधर से उधर भागती...
कभी थकती...
कभी हांफती...
कभी थकती...
कभी हांफती...
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