सरलता का वीभत्स रूप, जटिलता का सूक्ष्म आकार हूँ
अगणित तारकों की ऊर्जा, नभ का अनन्त विस्तार हूँ मैं|
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड नापने को उत्कल,
एक हरित बीज का तत्व-सार हूँ मैं|
निमिष मात्र में भस्म करने को तत्पर,
क्षण-भंगुरता का सतत प्रसार हूँ मैं|
पहुँचाना चाहा तुमने जिसे हाशिये पर,
वही, अग्निपथ से लौटा भयंकर हाहाकार हूँ मैं|
बन आम-जन की भाषा, चुभता तुमको,
हर एक गण की व्यथित चीत्कार हूँ मैं|
बन धृतराष्ट्र तुमने जिस देश को परोक्ष रखा
उसी भारतवर्ष की अब तक दबी हुँकार हूँ मैं,
हूँ अकिंचन, अल्पज्ञ और शायद नौसिखिया भी,
पर तुम्हारे कर्मों का एक कुशल साहूकार हूँ मैं,
भर चुके हैं घड़े पाप के अब सब तुम्हारे,
पर तुम्हारी कुण्डली का अंतिम सभ्य व्यवहार हूँ मैं,
खग-मृग-सरीसृप मानव-सुर-असुर; हूँ मित्र सबका,
पर इस राष्ट्र के दीमकों के मृत्यु की पुकार हूँ मैं...
हो चुका इस मंच पर अब विद्रूपण पूरा तुम्हारा,
जो तुम्हें हो असह्य वही सम्यक आचार हूँ मैं|
काबुल से कन्याकुमारी औ अटक से कटक तक का यशगान,
सौराष्ट्र से तवांग तक विस्तृत, इस सिन्धुदेश का व्यापार हूँ मैं
हूँ खटकता तुम्हे और रोड़ा हूँ तुम्हारे अजगरी इरादों का,
अब नहीं चलनी शकुनि चालें तुम्हारी, अब पहले से समझदार हूँ मैं,
नेपथ्य की संभावनाएं भी अब मत तलाशो, कि बहुत हुआ अब,
सजग प्रहरी इस राष्ट्र का, इस जन-पर्व का सशक्त सत्कार हूँ मैं...
और हाँ,
अब बस खेल पूरा ही समझो, कि इस लोकतन्त्र का पहरेदार हूँ मैं...
... इस लोकतन्त्र का चौकस पहरेदार हूँ मैं...
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