ना जाने कितने चेहरे धुले होंगे,
ना जाने कितने मुखौटे उतरे होंगे;
इस बारिश में ।।
ना जाने कितने ख्वाब जागे होंगे,
ना जाने कितने सपने टूटे होंगे,
इस बारिश में ।।
ना जाने कितनी बांछें खिली होंगी,
ना जाने कितने माथे सिकुड़े होंगे,
इस बारिश में ।।
ना जाने कितनी कागज़ की नावें तैरी होंगी,
ना जाने कितने जहाज़ डूबे होंगे;
इस बारिश में ।।
ना जाने कितनी ऊँचाइयाँ किसी ने छुयी होंगी,
ना जाने कितनी पगड़ियाँ उछली होंगी;
इस बारिश में ।।
ना जाने कितनी नींव पड़ी होंगी,
ना जाने कितने झोपड़े ढहे होंगे;
इस बारिश में ।।
ना जाने कितनी आँखें चमकी होंगी,
ना जाने कितनी आँखें बुझी होंगी;
इस बारिश में ।।
ना जाने कितनी कलाइयाँ मुड़ी होंगी,
ना जाने कितनी चूड़ियाँ टूटी होंगी;
इस बारिश में ।।
ना जाने कितने मंसूबे बंधे होंगे,
ना जाने कितनी हिम्मतें टूटी होंगी;
इस बारिश में ।।
ना जाने कितने कलमे किसी ने पढ़े होंगे,
ना जाने कितनी मिन्नतें किसी ने की होंगी;
इस बारिश में ।।
ना जाने कितनी बाढें आई होंगी कोसी में,
ना जाने कितने विदर्भ सूखे होंगे;
... इसी बारिश में ।।
#भईया_उवाच
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#बारिश
#Destiny
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Monday, 10 August 2015
~बारिश~
Tuesday, 4 August 2015
~मिलूँगा मैं...~
पूनम की झिलमिल रौशनी में नही,
मिलूँगा मैं अमावस की चादर के अन्दर !
उस चिर-प्रतीक्षित स्वाति नक्षत्र में नही,
मिलूँगा मैं उस भयंकर सूखे की बेला में !
उस नव-पल्लवित फुलवारी के बीच नहीं,
मिलूँगा मैं उस बियाँबान मरुस्थल के रेत के टीलों के बीच !
उस नए खड़े मॉल की एलीवेटर के घूमते पट्टों के सहारे टिक कर नहीं,
मिलूँगा मैं उस अन्जान, स्याह सड़क पर !
शरद की उस पहली ओस पर चलते हुए नहीं,
मिलूँगा मैं उस तपती अकेली राह पर !
चकमक करती इस जगमगाहट में नहीं,
मिलूँगा मैं उस दोराहे के बंद, निराश मुहाने पर !
उन तालियों की गड़गड़ाहट के बीच नहीं,
मिलूँगा मैं उस नितांत अकेले पल में !
उन रुबाइयों, कव्वालियों, गीतों और विलास में नहीं,
मिलूँगा मैं अंतर्द्वंद्वों और संशयों के क्षण में !
उन उत्त्तेजित करती और दंभ भरती सराहनाओं के बीच नहीं,
मिलूँगा मैं उस वास्तविक विडंबनाओं के करीब !
उन सफताओं की अट्टालिकाओं पे चढ़ चिल्लाता हुआ नहीं,
मिलूँगा मैं उस जीवन समर के जूझते पल में !
... तुमसे !!
क्यूंकि,
तब तुम , तुम होगे ।
बस तुम !
और मैं,
... हम !!
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#हम