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Thursday, 16 August 2018

~ ये अच्छी बात नहीं है... ~


(श्री अटल बिहारी बाजपेयी : 25 दिसम्बर, 1924 : 16 अगस्त, 2018 )

हम काफ़ी छोटे थे जब आप ने 1991 में लखनऊ से अपना पहला चुनाव लड़ने का निर्णय लिया था| हर तरफ आपके पोस्टर थे, चर्चे थे, नारे थे|
“सबको देखा बारी-बारी, अबकी बारी अटल बिहारी!” ये सुन कर हमने आपको बिहार का मान लिया था | अल्पज्ञ थे, अनभिज्ञ थे |

फिर आया आपका दूसरा चुनाव 1996 में, तब तक आपके भाषण सुनने को मिल चुके थे | शायद भान हो चुका था कि आप बिहार से नहीं हैं|

उसके बाद आपकी एक जनसभा थी 1998 में, लखनऊ के पत्रकार पुरम चौराहे पर जो हमने दूर से सुनी थी| (और आज भी साभिमान यह कहते हैं कि हमने आपको सामने से सुना है|)

तब यह जान चुके थे कि आप मध्य प्रदेश से आये थे लखनऊ| पर शायद समझने लगे थे कि आप इन भौगोलिक सीमाओं से परे हैं| ( ये दीगर बात है कि आज विकिपीडिया ने बताया कि आप मूलतः उत्तर प्रदेश से ही थे|)
जब ये नहीं समझते थे कि संयुक्त राष्ट्र क्या है, उसका महत्त्व क्या है, व वहाँ कैसे पहुँचा जाता है, तब भी यह सुन कर कि आपने उस विशाल मंच पर भी हिन्दी में अपना भाषण दिया, छाती गर्व से फूल जाती थी|

साल था 1998| गर्मी की छुट्टियाँ थीं और हम शाम को खेलने गए हुए थे और पार्क में ये चर्चा थी कि आज भारत ने परमाणु विस्फोट किया| अब उत्तर प्रदेश में ऐटम बम के नीचे तो बात होती नहीं थी उस वक़्त, तो पहले हल्के में लिया| पर फिर अपने भाइयों की बातों से समझ आया की मुद्दा उतना हल्का नहीं जितना हमारा बाल-मन मान के बैठा था| जब ये सुना कि अमरीका प्रतिबन्ध लगायेगा, पेट्रोल और बाकी आयातित सामानों की कमी हो जायेगी तो डर भी गए थे| पर फिर उन दोनों (मेरे दोनों बड़े भाई) को ये बोलते भी सुना कि क्लिंटन (तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति) आपके दोस्त हैं तो कुछ राहत हुई थी कि चलो आप कुछ न कुछ तरकीब तो निकाल ही लेंगे | न जाने क्यूँ एक वो सुपरमैन वाला विश्वास था आप पर | (सनद रहे शक्तिमान तब तक आये नहीं थे|) |

तब जाकर शायद समझ आया कि कलम से सौन्दर्य बिखरने वाला एक कवि-हृदय किस प्रकार एक बटन से ध्वंस की प्रस्तावना भी लिख सकता है|

फिर करगिल हुआ, और आपका वो अटल-अडिग स्वरुप देखने को मिला| तब पता चला के पहनावे से सरल व्यक्ति भी कितना वज्र सा कठोर हो सकता है|

2002 में गुजरात में हुये दंगों के बाद आप ही थे जिन्होंने कैमरा के सामने वर्तमान प्रधानमन्त्री को हिदायत दी थी कि “मुख्यमंत्री को राजधर्म का पालन करना चाहिए। जाति, वर्ण या संप्रदाय के आधार पर भेद नहीं होना चाहिए।”

2004 के चुनावों में “भारत उदय” के नारे के साथ आप आश्वस्त थे कि जीत आपकी ही होगी, किन्तु जब आवश्यक संख्या बल नहीं हुआ तो आपने विपक्ष में बैठने का साहसी निर्णय लिया| हालाँकि कुछ दलबदलू घोड़े बिकने को तैयार थे और तैयार थे कुछ तथाकथित सूटकेस, हाथ बदलने को|

खैर...

“ सरकारें आएंगी-जाएंगी, पार्टियां बनेंगा-बिगड़ेंगी पर यह देश रहना चाहिए...इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए.... ”
ऐसा सुनने, देखने को अब शायद ही मिले...

क्या ही बोलें, क्या ही न उड़ेल दें??
जब आप बोलने में इतना संयम बरतते थे, इतना रुक-रुक कर, इत्मीनान से बोला करते थे, तो थोड़ा और रुक ही जाते न|

अब ऐसी भी क्या ठन गयी ??

ये कोई अच्छी बात नहीं है...

दिवंगत को नमन !!
अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि!!