कभी बादलों को देखा है ऊपर से?
वो ऊपर को मुँह खोले से दीखते हैं।
उन पर काम नही करता गुरुत्व।
पृथ्वी का भी नही; और
न ही खींच पाता है नीचे,
कोई भी...
वो बस घूमते हैं,
मनमौजी से,
इस नदी से उस नगर,
इस देश से उस शहर...
परवाह नही ढोते वो।
वो तो बस उठते हैं,
उड़ते हैं, चलते हैं।
परवाज़ नही खोते वो।
वो तो बस अपने मे ही
रमते हैं।
बिना रुके चलते हैं।
तो अगर हो चाह, उठने की।
हो जाना थोड़े बेख़बर।
उठ जाना आस-पास से।
थोड़े बेपरवाह हो जाना।
नही सोचना चलने के पहले,
और चढ़ने के तो बिल्कुल भी नही।
पर हाँ,
शर्त होगी।
शर्त ये कि जब होगे
बहुत ऊपर।
बिखरना होगा।
बन के बारिश
बरसना होगा।
आना होगा लौट,
अपनी नदी, अपने नगर,
अपने देश, अपने शहर...
मिल जाने को उसमें
जो तुम्हारा है।
जो तुम हो,
जो तुमसे है, उस में।
बस उसी में।
फिर जब लगे कि
उगना है अब,
तो बस मन बना कर
खुद को थोड़ा अलग कर,
सम्भल कर,
चल पड़ना
उठने को, उड़ने को...
फिर असर नही करेगा
कोई भी बल, तुम पर।
गुरुत्व तो बिल्कुल भी नही।
किसी का भी, कैसा भी, कभी भी...