एच. एस. आर. ए. तक ‘सभा’ करी,
पढ़ी किताबें, किये नाटक औ लेख लिखे,
चौंक उठी पूरी हुकूमत बर्तानी,
अब ना हैं वो दुर्गा भाभी; और न अब
तुम्हें सिखाने आयेंगे ‘आज़ाद’ कभी,
हूँ खुश मैं, तुम सच मानो,
अच्छा है भगत तुम आज नहीं।
लेने को लाला जी का बदला,
तुमने सौन्डर्स का भला किया,
पर्चे बांटे-बम फोड़े, बटुकेश्वर संग जेल गये,
की हड़तालें; लाठी खाई, इन्कलाब को बुलन्द किया,
पर ना आने दी सिद्धांतों पर आँच कभी,
हूँ सुकूं से मैं, तुम यकीन करो,
अच्छा है भगत तुम आज नहीं।
ना थके कभी, ना झुके कभी,
किया ग़दर हर मौके पर,
रखे विश्वास विचारों के अमरत्व में,
ना करी जान की परवाह कभी,
रखे जेब में लेनिन, ट्रोट्स्की को,
रहे नास्तिक, और लड़ने से आये कभी बाज़ नहीं,
है प्रसन्न मन, विश्वास करो,
अच्छा है भगत तुम आज नहीं।
किया सब लगभग सब अमनी तौर पर,
पर वो तारीख़ में ना दर्ज़ हुये|
ना पसन्द उन्हें कि गूंजे नाम तुम्हारा,
ना ही सहन के बुलाये तुम्हें शहीद कोई,
क्या अंग्रेज़ और क्या ही कॉंग्रेस,
ना हुए उन्हें तुम बर्दाश्त कभी,
हूँ मगन मैं, तुम बात मानो,
अच्छा है भगत तुम आज नहीं।
वो करते भरसक कोशिश,
के ना तुम आगे बढ़ पाओ, और
जी भर ये भी के लोग न तुमको जान सकें,
पर शायद ये इल्म नहीं के इनके रोके,
रुकती ना तुम्हारी परवाज़ कभी,
है बात ख़ुशी की, मैं बतलाऊं ,
अच्छा है भगत तुम आज नहीं।
सच मानो तो तुम्हारे जैसी,
है आज कोई आवाज़ नहीं।
होती तो दबा देते, वो ठहराकर उसे भगवा,
कर चुके घोषित तुम्हें आतंकी,
अब है इसमें कोई राज़ नही।
हूँ खुश मैं; तुम सच मानो,
अच्छा है भगत तुम आज नहीं।
... हूँ खुश मैं; तुम सच मानो,
अच्छा है भगत तुम आज नहीं।।
