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Wednesday, 19 December 2018

किताबघर और क़िस्से...

अच्छा सुनो!
मिलो किसी दिन,
किसी किताबघर में|

कुछ देर बैठेंगे, 
कुछ क़िस्से सुनाएंगे,
सुना है
वहाँ  पैसे नहीं लगते,
वक़्त बिताने के,
क़िस्से पढ़ने के,
क़िस्से सुनाने के...

पढ़ेंगे वो सारे क़िस्से,
कहे-अनकहे...
सुने-अनसुने...
और खोल कर पढ़ेंगे
वहाँ रखी किताबें,
सारी की सारी।
और क़िस्से भी
जो  निकलने को होंगे
अपनी ही किताबों से...

जेबें खाली हैं तो क्या,
क़िस्से अब भी काफ़ी  हैं,
और भी क़िस्से बुनने हैं,
वो सभी छोटे-बड़े, जो
क़िस्से अब भी अपने हैं...

और तो और,
क़िस्से लिखने के अब भी पैसे नहीं  लगते,
और पैसे  नहीं लगते क़िस्से सुनाने के,
और ना ही क़िस्से बनाने के,
शायद...

#किताबघर
#क़िस्से

Saturday, 8 December 2018

तुम्हें इतवार होना था...

सुनो,
तुम्हें दिनों में इतवार होना था,
सालों और महीनों में नहीं,
हर हफ़्ते में एक बार होना था।

नहीं, इसलिये नहीं के फ़ुरसत  से होंगे,
तुम्हें बस उन छः दिनों का इंतज़ार होना था।

जो उन छः दिनों के इकट्ठे बादल बरस पड़ने को हों
तुम्हें  सातवें दिन का इक खुला आसमान होना था।

तुम नहीं उस कैलेंडर में छपा एक लाल नंबर भर,
तुम्हें पाकर अच्छा कोई बीमार होना था।

जब तक मिलेंगे खुल कर, तुम गुज़र लोगे,
पर खूबसूरती इसी में के बस दीदार होना था।

अब आ ही गए हो तो ठहरो, क्या कुछ है जल्दी,
क्यूँ वक़्त का पाबंद तुम्हें यूँ बेशुमार होना था...

सालों और महीनों में नहीं, तुम्हें
हर हफ़्ते में कम-से-कम एक बार होना था,
यकीं मानो,
तुम्हें दिनों में इतवार होना था...
और कुछ नहीं बस
तुम्हें दिनों में इतवार होना था...

#इतवार
#Sunday

Thursday, 6 December 2018

~ अन्दर का शोर ~

वो  अपने अन्दर के शोर को दबाने के लिए
एक बड़ा शोर ढूँढता  रहा।
और फ़िर उसी शोर में  कब ग़ुम हो गया,
इस बात का कोई शोर नहीं हुआ।

उसको नहीं सुनाई दिया शायद
वो संगीत जो निकल रहा था,
छनती चाय,
चाशनी में डूबती जलेबी,
तलते पकौड़े  और
जलते  चूल्हों  से....

वो आवाजें  जो आ रही थीं
सरकती रहट,
रेंगते रिक्शे,
चलती बस  और
गुज़रती ट्रेन से...

वो खनक  जो निकल रही  थी,
मैदान की सीटी,
फ़ुटबाल बनते टिफ़िन,
खोती  बोतलों  और
खनकते  सपनों से...

वो थाप जो पैदा होती थी,
ढोली के ढोलक,
मदारी के डमरू, 
साधू के मंजीरे और
मंदिर के घंटे से...

वो पुकार जो निकलती थी
किसी बच्चे के तुतलाने,
गाय  के रंभाने,
बकरी के मिमियाने  और 
उस बूढ़े तोते के दोहराने से...

वो चहक जो पैदा होती थी,
चरचराते झूले,
उस  बच्चे  की गुल्लक,
उस जीते हुए कप और
कैरम में टकराती गोटियों से...

और नहीं सूँघी शायद उसने
मंदाती, थमती और फिर
कुछ भी कर चल पड़ती हुई ज़िन्दगियाँ,

और...

नहीं पहचाने शायद,
अपनी ही ज़िन्दगियों  के विरले संगीत पर
अपनी ही  धुन पर थिरकते लोग,
जो  शायद उस जैसे ही थे;
पर कभी-कभी रुक कर,
सुन लेते थे वो संगीत,
जो उपजता था कभी
उनके आस-पास और
कभी उनके अन्दर से ही...

#शोर
#ज़िन्दगी
#ViciousCalledLife

Friday, 28 September 2018

अच्छा है भगत तुम आज नहीं।


... थे नौजवान, करते बात ‘भारत’ की,
एच. एस. आर. ए. तक ‘सभा’ करी,
पढ़ी किताबें, किये नाटक औ लेख लिखे,
चौंक उठी पूरी हुकूमत बर्तानी,
अब ना हैं वो दुर्गा भाभी; और न अब
तुम्हें सिखाने आयेंगे ‘आज़ाद’ कभी,
हूँ खुश मैं, तुम सच मानो,
अच्छा है भगत तुम आज नहीं।

लेने को लाला जी का बदला,
तुमने सौन्डर्स का भला किया,
पर्चे बांटे-बम फोड़े, बटुकेश्वर संग जेल गये,
की हड़तालें; लाठी खाई, इन्कलाब को बुलन्द किया,
पर ना आने दी सिद्धांतों पर आँच कभी,
हूँ सुकूं से मैं, तुम यकीन करो,
अच्छा है भगत तुम आज नहीं।

ना थके कभी, ना झुके कभी,
किया ग़दर हर मौके पर,
रखे विश्वास विचारों के अमरत्व में,
ना करी जान की परवाह कभी,
रखे जेब में लेनिन, ट्रोट्स्की को,
रहे नास्तिक, और लड़ने से आये कभी बाज़ नहीं,
है प्रसन्न मन, विश्वास करो,
अच्छा है भगत तुम आज नहीं।

किया सब लगभग सब अमनी तौर पर,
पर वो तारीख़ में ना दर्ज़ हुये|
ना पसन्द उन्हें कि गूंजे नाम तुम्हारा,
ना ही सहन के बुलाये तुम्हें शहीद कोई,
क्या अंग्रेज़ और क्या ही कॉंग्रेस,
ना हुए उन्हें तुम बर्दाश्त कभी,
हूँ मगन मैं, तुम बात मानो,
अच्छा है भगत तुम आज नहीं।

वो करते भरसक कोशिश,
के ना तुम आगे बढ़ पाओ, और
जी भर ये भी के लोग न तुमको जान सकें,
पर शायद ये इल्म नहीं के इनके रोके,
रुकती ना तुम्हारी परवाज़ कभी,
है बात ख़ुशी की, मैं बतलाऊं ,
अच्छा है भगत तुम आज नहीं।

सच मानो तो तुम्हारे जैसी,
है आज कोई आवाज़ नहीं।
होती तो दबा देते, वो ठहराकर उसे भगवा,
कर चुके घोषित तुम्हें आतंकी,
अब है इसमें कोई राज़ नही।
हूँ खुश मैं; तुम सच मानो,
अच्छा है भगत तुम आज नहीं।

... हूँ खुश मैं; तुम सच मानो,
अच्छा है भगत तुम आज नहीं।।

Monday, 10 September 2018

भारत बन्द !




आज चूँकि भारत-बन्द का आह्वान था भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के द्वारा  तो हमारे कार्यस्थल के  बाहर कुछ  बल्लम-बेलचा  धारी झुण्ड में बैठे थे|   अब इधर  हम भी कुर्सी तोड़-तोड़ के मोटे हो चुके हैं तो अब दौड़ने की झस बची नहीं है,   इसलिए  भिड़ना  बेवकूफी होती|  यही सब गुणा-गणित  करते पास की दुकान पर चाय पीने बैठ गये|


अब सब तो उत्पाती  होते नहीं तो एक-दो  एक्टिविस्ट (जैसा उनके मुँह  से सुना),  कार्यकर्ता बेहतर लगता शायद,  (अधेड़ उम्र के)   लड़के आकर पास की पान की गुमटी पर धाक जमाने लगे कि ‘सब बन्द करा दिया’ |   पान वाले चाचा शायद बिहार के थे जो कि कौतूहलवश पूछ बैठे “भाईना,  ये बताइए  कि ये बन्द  आप लोग कर किसलिए रहे हैं?”

  
एक्टिविस्ट भाईना : आज भारत-बन्द है इसलिए!
पान वाले चाचा :  हाँ,  वो तो सुना, पर है क्यूँ?


एक्टिविस्ट भाईना : अरे,  अब है तो है !
पान वाले चाचा :  हाँ , मान लिया|  पर भाईना कारण तो होगा कोई ?

(इस पर भाईना  चुप!)
(फ़िर बगल वाले चिंटू ने धीरे से कुछ समझाया)

एक्टिविस्ट भाईना :  हम लोग बढ़ते हुए पेट्रोल और डीज़ल के दामों के  विरोध में ये बंद करवा रहे हैं| 
पान वाले चाचा :  तो क्या इस से पेट्रोल और डीज़ल के दाम कम हो जायेंगे|

(भाईना फिर चुप!)

एक्टिविस्ट भाईना :  हाँ, और क्या |  पार्टी का आदेश है और हमारे नेता ने कहा है  कि इसे सफल बानाना  है|
पान वाले चाचा :  तो सफल तो हो गया न|  ये ऑफिस,  वो दुकानें बन्द करा दीं आप लोगों ने भाईना|

(ये सुन भाईना और चौड़ीया गये|)

एक्टिविस्ट भाईना :  हाँ तो और क्या?  सफल करना ही था |   उधर बड़े बाज़ार  की तरफ तो कई बस-वस  भी फोड़े हैं हमारे लड़के|
पान वाले चाचा :  उस से क्या फायदा भाईना?  कल उन्ही लड़कों को  कॉलेज जाने में तकलीफ होगी जब बस नहीं मिलेगी|


एक्टिविस्ट भाईना :  अरे, अब थोड़ी तकलीफ तो झेल ही सकते हैं|  क्रांति ऐसे नहीं आती चाचा |
पान वाले चाचा :  अच्छा तो आप क्रांति ले आयेंगे|

  
एक्टिविस्ट भाईना : हाँ,  बिलकुल|
पान वाले चाचा : अच्छा|  और इस बन्द और तोड़-फोड़ से कैसे क्रांति आएगी?  
  

एक्टिविस्ट भाईना :  आयेगी चाचा,  आएगी|  बस देखते जाओ|  अभी तो बस पेट्रोल और डीज़ल के दाम कम करवाने हैं|
पान वाले चाचा :  वो कैसे होगा?


एक्टिविस्ट भाईना : अरे चाचा,  आप भी न बहुत सीधे हो|  देखो,  ये ऑफिस  बंद हुआ;  लोग नहीं आये| गाड़ियाँ कम निकली सड़क पर|  तो पेट्रोल कम खर्च हुआ |  जब मांग कम होगी तो तेल कंपनियों को अपनी बिक्री बढाने के लिए दाम और कम करने पड़ेंगे|  फिर धीरे-धीरे पेट्रोल के दाम कम हो जायेंगे|
पान वाले चाचा :  और  जो बस-वस फोड़े हो भाईना आप,  उसका कैसे सरोकार है?


एक्टिविस्ट भाईना : अरे चाचा!  आप भी ना|  जब बस फोड़ दी गयी तो बस भी नहीं चलेगी|  और जब बस नहीं चलेगी  तो पेट्रोल भी खर्च नहीं होगा| फिर दाम और कम होंगे|
पान वाले चाचा :  (अपने रेडियो की आवाज़ तेज़ कर दी  और चुपचाप पान लगाने में व्यस्त हो गये |)


(बगल वाले चिंटू ने फिर धीरे से  कहा ‘भाईना, बस डीज़ल से चलती है|’ 
उस के बाद उसने बाइक स्टार्ट की और कब चला गया पता ही नहीं चला|)

और एक्टिविस्ट भाईना अपना महंगा फ़ोन निकाल कर किसी को दुसरे मोहल्ले में एक-दो  पेट्रोल वाली कार फोड़ने का निर्देश देने लगे...

(फ़ोन के वाल-पेपर में भाईना  और उनके नेता की एक  विजयी मुस्कान वाली तस्वीर लगी थी|)


#भारत_बन्द



Thursday, 16 August 2018

~ ये अच्छी बात नहीं है... ~


(श्री अटल बिहारी बाजपेयी : 25 दिसम्बर, 1924 : 16 अगस्त, 2018 )

हम काफ़ी छोटे थे जब आप ने 1991 में लखनऊ से अपना पहला चुनाव लड़ने का निर्णय लिया था| हर तरफ आपके पोस्टर थे, चर्चे थे, नारे थे|
“सबको देखा बारी-बारी, अबकी बारी अटल बिहारी!” ये सुन कर हमने आपको बिहार का मान लिया था | अल्पज्ञ थे, अनभिज्ञ थे |

फिर आया आपका दूसरा चुनाव 1996 में, तब तक आपके भाषण सुनने को मिल चुके थे | शायद भान हो चुका था कि आप बिहार से नहीं हैं|

उसके बाद आपकी एक जनसभा थी 1998 में, लखनऊ के पत्रकार पुरम चौराहे पर जो हमने दूर से सुनी थी| (और आज भी साभिमान यह कहते हैं कि हमने आपको सामने से सुना है|)

तब यह जान चुके थे कि आप मध्य प्रदेश से आये थे लखनऊ| पर शायद समझने लगे थे कि आप इन भौगोलिक सीमाओं से परे हैं| ( ये दीगर बात है कि आज विकिपीडिया ने बताया कि आप मूलतः उत्तर प्रदेश से ही थे|)
जब ये नहीं समझते थे कि संयुक्त राष्ट्र क्या है, उसका महत्त्व क्या है, व वहाँ कैसे पहुँचा जाता है, तब भी यह सुन कर कि आपने उस विशाल मंच पर भी हिन्दी में अपना भाषण दिया, छाती गर्व से फूल जाती थी|

साल था 1998| गर्मी की छुट्टियाँ थीं और हम शाम को खेलने गए हुए थे और पार्क में ये चर्चा थी कि आज भारत ने परमाणु विस्फोट किया| अब उत्तर प्रदेश में ऐटम बम के नीचे तो बात होती नहीं थी उस वक़्त, तो पहले हल्के में लिया| पर फिर अपने भाइयों की बातों से समझ आया की मुद्दा उतना हल्का नहीं जितना हमारा बाल-मन मान के बैठा था| जब ये सुना कि अमरीका प्रतिबन्ध लगायेगा, पेट्रोल और बाकी आयातित सामानों की कमी हो जायेगी तो डर भी गए थे| पर फिर उन दोनों (मेरे दोनों बड़े भाई) को ये बोलते भी सुना कि क्लिंटन (तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति) आपके दोस्त हैं तो कुछ राहत हुई थी कि चलो आप कुछ न कुछ तरकीब तो निकाल ही लेंगे | न जाने क्यूँ एक वो सुपरमैन वाला विश्वास था आप पर | (सनद रहे शक्तिमान तब तक आये नहीं थे|) |

तब जाकर शायद समझ आया कि कलम से सौन्दर्य बिखरने वाला एक कवि-हृदय किस प्रकार एक बटन से ध्वंस की प्रस्तावना भी लिख सकता है|

फिर करगिल हुआ, और आपका वो अटल-अडिग स्वरुप देखने को मिला| तब पता चला के पहनावे से सरल व्यक्ति भी कितना वज्र सा कठोर हो सकता है|

2002 में गुजरात में हुये दंगों के बाद आप ही थे जिन्होंने कैमरा के सामने वर्तमान प्रधानमन्त्री को हिदायत दी थी कि “मुख्यमंत्री को राजधर्म का पालन करना चाहिए। जाति, वर्ण या संप्रदाय के आधार पर भेद नहीं होना चाहिए।”

2004 के चुनावों में “भारत उदय” के नारे के साथ आप आश्वस्त थे कि जीत आपकी ही होगी, किन्तु जब आवश्यक संख्या बल नहीं हुआ तो आपने विपक्ष में बैठने का साहसी निर्णय लिया| हालाँकि कुछ दलबदलू घोड़े बिकने को तैयार थे और तैयार थे कुछ तथाकथित सूटकेस, हाथ बदलने को|

खैर...

“ सरकारें आएंगी-जाएंगी, पार्टियां बनेंगा-बिगड़ेंगी पर यह देश रहना चाहिए...इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए.... ”
ऐसा सुनने, देखने को अब शायद ही मिले...

क्या ही बोलें, क्या ही न उड़ेल दें??
जब आप बोलने में इतना संयम बरतते थे, इतना रुक-रुक कर, इत्मीनान से बोला करते थे, तो थोड़ा और रुक ही जाते न|

अब ऐसी भी क्या ठन गयी ??

ये कोई अच्छी बात नहीं है...

दिवंगत को नमन !!
अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि!!




Friday, 13 July 2018

लो, हो गये हम बड़े !

~ लो, हो गये हम बड़े ! ~

पहले बड़े होने का मतलब होता था,
अपने फीते खुद बांधना,
खाना अपने हाथों से खाना,
दूध जल्द से जल्द ख़तम करना।

फिर कुछ समय बाद,
बड़े होने का मतलब बदला,
और उसमें शामिल हो गया,
अपने कपड़े खुद धोना,
खेल के आने के बाद चुपचाप पढ़ने बैठना
होम वर्क खुद से करना ।

फिर कुछ समय और बीता,
और बड़े होने के मतलब बदले,
अब जुड़ता गया,
दोस्त सही से चुनना,
घर में सिर्फ चुनिंदा लोगों को लाना,
माँ का हाथ बटाना,
पिता जी के सामने अदब से पेश आना।

और फिर,
एक दिन अचानक,
हम बड़े हो जाते हैं,
रख के उस बचपन को पीछे,
जो शायद अब भी कहीं कुलबुला रहा होता है,
अन्दर;
उठा लेते हैं गट्ठर ज़िम्मेदारियों का,
जिसकी गाँठ बंधी है चुपचाप किये गए वादों से,
माँ की आशाभरी मुस्कानों से,
पिता के ज़्यादातर झूठे गर्व से,
और अपने अन्दर की सामाजिक शर्म से;

और बस,
उन अधजन्मे शिशु से सपनों को छोड़,
बढ़ जाते हैं आगे,
बड़े होने के लिए...
खुद से खुद की रेस में जीतने के लिये,
खुद को ही कहीं पीछे छोड़ कर,
खुद से किये अनगिनत वादों को तोड़ कर,
सपनों के बड़े-बड़े नोटों को पतला सा मोड़ कर,
भूल जाते हैं किसी कोने में छोड़कर,
हसरतों को सुखा देते अपने ही हाथों से,
पूरी तबियत से निचोड़कर,

और बस,
बरबस ही,
बिना इच्छा के,
हो जाते हैं बड़े,
बचपन अभी भी कुलबुला रहा होता है,
कहीं अन्दर,
सपने अभी भी सांस ले रहे होते हैं,
किसी भूले से कोने में,
हसरतों को रौंद कर अपने ही कदमों से,
खुद को, खुद से, खुद की ही रेस में हराने के लिए,
... लो, हो गये हम बड़े।।

#भईया_उवाच्
#BhaiyaSpeaks
#Dreams
#RatRace

Wednesday, 16 May 2018

गर्मी की छुट्टी और कर्नाटक का नाटक।

हमें याद है एक बार हम गर्मी की छुट्टियों में  हम प्रतापगढ़ में  अपने पैतृक घर गए हुए थे।

अब दोपहर में कौन ही सोये, इसके लिये जब दादी और चाची लोग  आराम करने को होती थीं तो हम सारे भाई मिल कर बगिया में चले जाते थे।
हमारे पीछे-पीछे आते थे चिन्नी-मिन्नी बच्चे।

इनको वापस जाने को कहो तो मिन्नतें करते कि बस पेड़ के आस-पास रहेंगे। शिकायत भी  नहीं करेंगे और न जाने क्या-क्या दलीलें।

हम लोग या तो आम तोड़ते और खाते या फिर अगर आम तब तक नहीं आये होते तो पेड़  पर चढ़ते या चील्हर-पाती (जो शायद असल मे चील और पत्ती रहा होगा)  खेलते थे।
अब चूँकि हम लोग थोड़े बड़े थे तो  चढ़-उतर सकते थे।
पर जो ये पिछलग्गू चिन्नी-मिन्नी आते थे  वो खुद से चढ़  नहीं पाते थे और थोड़ी देर में हताश-निराश होकर चिढ़ जाते थे।
फिर नाटक शुरू होता कि हमें भी खिलाओ खेल।
पर  भाई, जब पेड़ पे चढ़ नही सकते तो खेलोगे कैसे?
बताओ भला?

अब चूँकि चोरी से आ गए हैं  और वापस जाने पे धुलाई पक्की है तो वो मुखबिर बनने को बेताब हो जाते थे।
कितना ही समझाओ कि 'आओ, खेलो!' या फिर 'पहले सीख लो, फिर खेलना!' पर नहीं। उनकी वापस जाने की रट जो शुरू होती तो बन्द होने का नाम नही लेती।

अब खेल तो सके नहीं और ठीकरा फोड़ना होता था हमारे सर, तो दौड़ते हुए  घर पहुँचते और जा कर  दादी के सामने ऐसे बात रखते जैसे इनको  हम जबरदस्ती ले गए थे।
और फिर दादी की संटी और हमारी सिट्टी-पिट्टी ग़ुम...
कसम से अब भी याद आता है तो इन सब को पटक के मारने का मन करता है।

अरे हाँ, ये कर्नाटक में  जो नाटक चल रहा है, उसे देख कर ही याद आया था।
बाकी आप खुद समझदार हैं।

#भईया_उवाच
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