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Thursday, 9 July 2015

तुम लिखो सावन और चढ़ते यौवन के बारे में !!


तुम  लिखो  सावन और  चढ़ते  यौवन के बारे में,
हम तो  सूखे और खोते  बचपन की ही सुध लेंगे |
                तुम रहो करते महिमामंडित अग्नि और सूर्य  को,
हम तो अंधेरों से ही अपनी राह निकालेंगे |
      तुम करते रहो उस हरियाली का  यशगान,
हम तो बंजर के  साथ  रह,  उसे  सम्हालेंगे |
      तुम गिन-गिन कर खुश हो लो अट्टालिकाओं की सीढियां,
हम तो उनके कमरों की दरी में अपने जवाब तलाशेंगे |
      तुम  करो अभिषिक्त उस नए दिन के उजाले को,
हम इन स्याह  रातों को  अपना प्रकाश-स्तम्भ  बना लेंगे |
      तुम  बन कृपा पात्र हर सुख का रसपान  करो,
हम विषमता के गरल को हँस के  गले  उतारेंगे |
      तुम रहो चूर मद में उनकी  उधार  की सफलताओं के,
हम दे साथ  संघर्षों  का, उनकी नाव पार लगावेंगे |
      तुम रहो जकड़े,  पकडे,  उन आशाओं की पूंछ,
हम निराशा को धकेल पीछे,  सूरज नए उगा लेंगे |
      तुम ख़ुशी  से भटको उन मखमली गलियारों में,
हम भरसक  इन  कंटीली वास्तविकताओं को  सम्हालेंगे |
      तुम नहाओ विदेशी मदिरा में,  करो  व्यसन,
हम इस मुफ्त चांपाकल से
अपनी प्यास बुझा लेंगे |
तुम करो स्थापित उनकी नयी  चतुराई  को,
हम इनकी  सरलता में खुद को पा लेंगे |
हो  तुम्हे गर्व उनकी उस  सतत्  ऊँचाई  पर,
हम इनकी सतह  के  किस्सों में गोते खा लेंगे |
वो बढें,  तुम  फलो-फूलो, यही  चलता रहे,
हम इनको जिंदा रखने में जान लगा देंगे |
तुम बने रहो चमक-दमक के साथी,
हम दियों  की रौशनी में इन्हें जीना  सिखा लेंगे |
तुम  लिखो  सावन और  चढ़ते  यौवन के बारे में,
हम तो  सूखे और खोते  बचपन की ही सुध लेंगे |



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