अरे, सुनो !
अभी लंच था ना,
तो उसके बाद,
मन हुआ कि कुछ मीठा हो जाये,
तो फाइनली,
सोन पापड़ी पे जा के टिके,
यहाँ, ऑफिस के बेसमेंट में एक दुकान है,
सिगरेट की,
ना-ना, दोबारा शुरू नहीं की भाई,
बस रेफरेंस दे रहा था यार...
अच्छा सुनो,
तो बस वही चेला अपना रखता है ,
पैकेट्स, सोन पापड़ी के भी।
सही थी, ट्रस्ट मी !
नर्म, हल्की मीठी और
पिस्ते की टॉपिंग के साथ...
बस जैसे ही काटने को चलो,
भरभरा के अलग -थलग...
बिखरने सी लगती है;
मग़र,
सच मानो, आनंद आ गया !
और,
बरबस ही आ गयी,
तुम्हारी याद भी,
कुछ ऐसी ही तो हो ना,
तुम भी !!
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