* सिर्फ़ , एक और...*
बड़े ही बेकल से थे,
वो दोनों ...
दोनों ही के ज़ेहन में थी,
बस एक ही ख्वाहिश,
'सिर्फ एक और'...
बहुत ही शिद्दत से थी तलाश,
उन दोनों को,
उस शख्स़ की,
... उस साथ की;
... या शायद उस एहसास की?
दोनों मिले,
रूहों का रिश्ता सा बना,
एक शून्य सा था,
जो भरा उसके आने से ।
... और एक खालीपन सा था ,
जो दूर हुआ इसके आने से ।
दिन गुज़रे,
बदला मौसम,
खुली कुछ धुप,
उतरने को हुए मुखौटे...
इसके लिए वो 'सिर्फ' निकला...
और ;
उसके लिए वो बस 'एक और'...
No comments:
Post a Comment