आज फिर लंच हुआ,
निपटाया खाना भी,
फिर बारी आई,
सोन पापड़ी की,
दोबारा !
आज फिर वही नरमी,
वही मिठास,
वही स्वाद,
जैसे तैयार सी थी वो,
एक दम से बिखर जाने को...
और फिर तभी हुआ,
एक बोध,
एक परिचय वास्तविकता से,
जीवन की,
कि ये सोन पापड़ी,
भले ही याद दिला जाती हो,
बरबस ही तुम्हारी,
पर ये बराबरी तो नहीं ही कर सकती,
तुम्हारी;
अरे, ये रोज़ मिल जो जाती है...
बस इसलिए!!
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