दफ़्न कर क्यूँ ना दूँ,
हर उस शख्स़ को,
जिसने पहला हाथ था बढाया,
उस मुस्कान के साथ,
जो झूठी थी, असल में;
जिसने थामा था,
मेरी थकी हुई उँगलियों को,
सहारा देने के लिए,
मक़सद सहारा देना था,
या कि पाना,
खुदा मालिक !
पर क्यूँ भला जगा गए,
जो कि सो चुका था,
मुझमें,
उस इंसान को,
मुस्कान दे के अपनी ?
आखिर क्यूँ ?
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