साँसों की मधुमय धुन पर, पलकों की सरसराहट से,
गुंजा देती हो तुम, उस भाव को, जो निर्द्वन्द्व सोया है,
जाने कब से, किसी अज्ञात से कोने में !
तुम मैं हो, या मैं तुम हूँ? ज़रा बतलाओ...
हो बालसखी ; या कि प्रिय तुम, यौवन का सद्वन्द्व मिलन?
उस चंचल, निश्छल विचरण में, कर-कमलों के उस बरबस बंधन में ;
तुमने किया था तृप्त मुझे? या कि था वो कोई दिवास्वप्न?
है अवश्य कुछ, बस जानो इतना !
हाँ, ज़रा बतलाओ, कह सकता हूँ ना 'प्रिय' तुमको?
ना और सम्बोधन कोई सूझा मुझको;
है बस कुछ साझा सा अपने बीच,
जो लाता है मुझको खींच,
ना ! तुम तक नहीं !
पर उस भाव तक अवश्य ही,
जो है उत्पन्न हुआ तुम्हारे आविर्भाव से ही !
अच्छा छोड़ो !
जाने भी दो;
बस ये बतला देना, जब वक़्त मिले,
क्या सचमुच ही, पहुँच सका कभी तुम तक भी,
वो भाव ?
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