पेड़ नहीं तुम सूर्य बनो,
ढूँढने वाले ढूंढ ही लेंगे,
छाया !
तुम बनो संबल उनका,
जिनको है आवश्यकता तुम्हारी,
तुम्हारी संचित ऊर्जा की,
तुम्हारी अविरल ज्वाला
की,
तुम्हारी प्राणदायिनी शक्ति की,
और,
तुम्हारी उस प्रेरणा की,
जो हर सुबह के साथ,
पुनर्जीवित कर जाती है,
अनेकों आशाओं और संभावनाओं को,
पुनश्च !
और,
दे जाती है एक जिजीविषा,
इस अथाह धरती के, हर कोने में बैठे,
छुपे, ऊंघते, सोते, पड़े
हर उस जैव-अजैव तत्व को !
तुम्हारी महत्ता उसी में
है,
और तुम्हारे अस्तित्व का अर्थ भी,
और, मोल भी !
छाया का क्या है,
निरी माया है !
जब जिसे चाहिए होगी,
पा ही लेगा,
कुछ भी कर...
एक ओट पाकर,
या फिर,
सिर झुका कर... !!
Behatreen! Adbhut! :)
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया! :)
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