ये किनारों पे लटके हुए जाले,
पंखों पे जमी हुई धूल,
इधर उधर फैले हुए कूड़े से टुकड़े,
ये बड़ी शिद्दत से गिरने को तैयार प्लास्टर,
शायद गर्मी से बेरंग हो चुकी चन्द किताबें,
उड़-उड़ के अपनी उपस्थिति का एहसास कराते,
ये पत्ते...
और गर्द का ढ़ेर अपने ऊपर ओढ़े,
ऊंघती सी कुछ यादें...
अब ये बताओ,
ज़रा मदद करोगे?
ये समझने में कि,
अब ये सिर्फ मकान है?
या कि मेरा घर...
बतलाओ, करोगे?
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