किसी सस्ते ढाबे के वाश बेसिन के साथ टंगे तौलिये सा महसूस करता हूँ,
जब तुम्हे हंसते हुए देखताहूँ;
तुम्हारी नम आँखों की तलहटी में उतर जाना चाहता हूँ,
मगर...
तुम्हारे कंधे पे वो बदलते हाथ,
कमर की गोलाई पे फिसलती वो उँगलियाँ,
और हर शनिवार एक नया पर्स या नेकलेस ,
चुभते हैं इक नश्तर से,
बहुत भीतर तक,
सच में,
फिर लौट आता हूँ,
यथार्थ की वास्तविकता में,
अपने तौलिये होने के अस्तित्व को महसूस करने,
और स्वीकार करने,
इस तथ्य को,
कि, इक तौलिया मात्र ही तो था,
बदलना ही था,
आज या कल...
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