नीचे जलती धरती थी,
सर पे आग उगलता सूरज था,
था समीप खड़ा विषुवत रेखा के,
ये शायद मेरा प्रारब्ध ही था,
हाँ, था थोड़ा विचलित,
थोड़ा कवलित,
कुछ इस झुलसती धरती से,
थोड़ा इस रोष दिखाते सूरज से...
फिर सोचा,
क्यूँ होते हो विचलित ?
जब अन्दर शीतल मन है,
बरसाने दो रोष इसको भी आज,
पर क्या ये कुछ शाश्वत सा है?
बस फिर, उसी क्षण में,
सोच बैठता हूँ तुमको,
उस सस्नेह स्पर्श को !
उस विश्वास को जो तुमने दिया था !
उस मुस्कान को जो तुम्हारी आभारी है !
उस आत्मबल को जो तुम्हारे सान्निध्य से उत्पन्न हुआ था !
उस पहल को, जो शायद वक़्त ने की थी !
उस शरारत को, जो आँखों से उतर नहीं पाई अब तक, शायद...
उस शर्म को, जो आँखों में आज भी महसूस सी होती रहती है,
तुम्हारी !
उस ममता को जो उभर ही आती है, तुम जितना भी ना चाहो...
उस उत्कंठा को, जिसे तुमने खानदानी तिजोरी के साथ छुपा रखी है,
उन अव्यक्त तरंग-भावों को, जिनके साथ द्वंद्व छिड़ा रहता है,
हम दोनों का ही !
हर उस क्षण को, जो बिता आया मैं तुम्हारे साथ,
और...
वो भी, जो नहीं बिता सका !
और भी, बहुत कुछ...
बस फिर, ठीक उसी क्षण ,
वो ऊष्मा, वो तपिश, वो जलन, वो तीक्ष्णता,
सब बेमानी से हो जाते हैं, और...
सूरज मित्र सा लगता है,
और ये झुलसाती धरती, पुनश्च माँ सी !!
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