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Wednesday, 22 April 2015

~ 'कठोर' ~

~ 'कठोर' ~
बैठ आज नदी के किनारे,
महसूस किया उस नमी को,
जो उतर उतर आयी थी,
नदी की गाद से होते हुए,
पास की उपजाऊ मिट्टी में।
बढ़ थोड़ा ऊपर,
पाया कि, कम हुई कुछ नमी,
और नरमी भी,
कभी मुलायम रही गाद ,
अब सूखी मिट्टी बन चुकी थी,
चढ़ ऊपर...
थोड़ा और...
पाया की तलहटी थी,
शुरू होती सी,
उस पहाड़ की,
जो बहुत ही मनोरम था,
थोड़ा दूर से,
चढ़े ज्यों-ज्यों...
कम होती गयी नमी,
खत्म सी होती दिखी नरमी,
जो परिणाम थी, शायद,
वर्षों की धूप, गर्मी और...
... अनवरत से दबाव का!
और अब वो नम, उपजाऊ और नर्म गाद,
बन चुकी थी,
मिट्टी...
शैल...
और अंततः पहाड़...
जो था सूखा,
मरू- सा,
और 'कठोर' !!
बस, शायद इसी तरह,
बन चुका था वो भी,
कठोर...

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