खुद को जलाने पे उतारू हूँ,
कुछ भी हो सामने, जुझारू हूँ|
बन के उड़ना था गरुड़ मुझे,
बन के पड़ा जटायु हूँ|
ना समझो ऐसा वैसा,
मैं चलूँगा तन कर के,
हूँ बलिष्ठ, हूँ मैं स्वमना,
इस मदमस्त देश का स्नायु हूँ|
ना रोक सकोगे तुम मुझे,
ना बांध सकोगे कुछ कर,
स्वमुग्ध सा हूँ अनुरक्त,
मैं जैसे अविरल वायु हूँ|
ना टोको मुझे, बस बढ़ने दो,
अपने मन की ही करने दो,
मैं रक्तबीज हूँ, नहीं चुकूँगा,
मैं स्वयं सहस्र-कोटि बाहू हूँ|
मैं भस्मासुर से प्रेरित हूँ,
जाने क्यूँ उद्वेलित हूँ?
हूँ सशक्त, किन्तु दिग्भ्रमित,
मैं इस कलियुग का सुबाहु हूँ|
बहुत जतन से था मिला कभी,
हूँ कहने को गण-तंत्र मगर,
क्या गण बचा, औ क्या बचा है तंत्र,
बस इस तथ्य पर शंकालु हूँ|
बन के उड़ना था गरुड़ मुझे,
बन के पड़ा जटायु हूँ...
बन के पड़ा जटायु हूँ...
#लोकतन्तर
#Democracy
#भारत_दुर्दशा
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