“...हवाओं से जो माँगा हिस्सा मेरा, तो बदले में हवा ने सांस दी!”
अमिताभ भट्टाचार्य की ये पंक्तियाँ भारत के एक कोने में कुछ कर सच हो जातीं तो क्या बात थी| कुछ कल्पना चावला, कुछ अब्दुल हमीद और शायद कुछ ठाकुर रोशन सिंह आज सांस ले रहे होते|
गोरखपुर और आस-पास का तराई क्षेत्र, जिसमे गोंडा, बस्ती, पश्चिमी बिहार और नेपाल का तराई क्षेत्र शामिल हैं, में मच्छरों का प्रकोप कुछ नया नहीं है| ये पूरा क्षेत्र जापानीज़ इन्सेफेलाईटिस (Japanese encephalitis) और एक्यूट इन्सेफेलाईटिस सिंड्रोम (Acute Encephalitis Syndrome) की चपेट में रहा है| बारिश के मौसम में जब मच्छरों की पैदावार पूरे ज़ोरों पर होती है तब ये दोनों ही बीमारियाँ अपना सर उठाती हैं| इनसे ग्रस्त होने पर पहले पहले दिमाग पर असर होता है, फिर रोगी कोमा में चला जाता है और कभी जीवित नहीं लौटता|
जापानीज इन्सेफ़ेलाइटिस से मौत गोरखपुर में पहली बार नहीं हुई है| अकेले इस क्षेत्र में वर्ष 1978 से लगभग 25000 मौतें हो चुकी हैं| और जो हाल रहता है भारत में आंकड़ों का, उसके हिसाब से ये कम से कम दोगुनी यानी 50000 होंगी| ऐसा नहीं है कि इससे बचाव के लिए प्रयास नहीं किये गए, पर जैसा कि विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि — 'Sometimes doing your best is not good enough. Sometimes you must do what is required.' मतलब ये कि कभी-कभी आपका सर्वश्रेष्ठ करना मात्र पर्याप्त नहीं होता, बल्कि वो कीजिए जिसकी आवश्यकता है|
क्या आप तब भी सो रहे थे जब आपके ‘स्वच्छ भारत सर्वे’ में गोंडा, जो कि गोरखपुर के पास ही है, को भारत का सबसे गन्दा जिला घोषित किया गया था? आंकड़े बताते हैं कि गोरखपुर की भौगोलिक स्थिति और वहाँ उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं पर आस-पास के जिलों और नेपाल की जनता का बोझ भी है| पर क्या इसको ओढ़कर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लीजियेगा ?
जिस कंपनी पर जिम्मा था ऑक्सीजन पहुँचाने का, पहले तो उसको ब्लैकलिस्ट किया जाये (तड़पा-तड़पा के मारना आपका संविधान देगा नहीं|) जिन स्वास्थ्य अधिकारियों का प्राथमिक दायित्व बनता हो उनकी तबियत से सेवा की जाए| अपनी सेवा जितनी देनी थी वो दे चुके| आप में अगर थोड़ी मानवीयता बची हो तो जा कर वहाँ कैंप कीजिये, आपके अनुयायियों के वक्तव्यों से अधिक आपकी दरकार है वहां पर| शायद इस दर्दनाक घटना के बाद कुछ सबक लें आप और आपके सोते हुए अफसरान|
ये जो साल दर साल होता आ रहा है, क्या यही होता रहेगा?
खैर...
बस इतना कहना है कि जो चलता आ रहा है वो ना चले|
‘कुछ कीजिये साहेब|’
काश की भट्टाचार्य बाबू की बाकी की पंक्तियाँ सच हो जातीं, वो बच्चे जिंदा होते और कह पाते –
“मुझे छोड़ दो मेरे हाल पे, ज़िन्दा हूँ यार काफी है...”
(आंकड़े indiatoday.in से साभार)
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