किसी सर्वहारा की
बहुत ही तेज़,
होती,
पर महसूस ना होती सी
अधूरी प्यास हूँ।
मैं घास हूँ...
उस,
सब दाँव पे लगा,
बैठे,
कुछ बदलने को
देखने को बेताब
किसी स्वप्न दृष्टा का
अनंतिम उच्छ्वास हूँ,
मैं घास हूँ...
किसी भूखी माँ की
सूखी छाती से
दूध उड़ेलने का
प्रयास करने का
सतत अभ्यास हूँ
मैं घास हूँ...
किसी अधमरे कारखाने के
किसी शांत कोने में
ठक-ठक करता
हिमालयी तपस्या में रत
किसी कर्मशील की
भड़ास हूँ,
मैं घास हूँ...
किसी रेड-लाइट इलाके में
किसी सफ़ेदपोश के
रंग ढूंढने की लिप्सा पर
जीवन-यापन की
मैली चादर ढाँकने का
प्रयास हूँ,
मैं घास हूँ...
#घास
#भईया_उवाच्
No comments:
Post a Comment