ना कोई नश्तर सही,
चाहे चुभूं एक साँस सा,
ऐसा कोई आभास सा,
जी हाँ,
मैं घास हूँ।
आपके तलवे के नीचे,
दबे सच का एहसास हूँ,
जो ना यूँ दब कर रहे,
और फिर जो सिर उठाये,
ऐसा सतत प्रयास हूँ,
जी-जी,
मैं घास हूँ।
आप जिसपे आ के पसरें,
या के कर जायें चहल-कदमी,
आयें, पर नहीं ही ठहरें,
वही नरम एहसास हूँ,
हाँ जी,
मैं घास हूँ।
ये धूप घटेगी,
आयेंगे बादल,
होगा थोड़ा माकूल मौसम,
साँस लेंगी फिर ये हरकतें
ऐसा अटल विश्वास हूँ,
मैं घास हूँ।
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