आप सोचते होंगे इस दुनिया को गति और दिशा नित हो रहे आविष्कारों ने दी है| ठीक भी है| पर कभी ये सोचा कि वो नित नए अविष्कार और खोजें आ कहाँ से रही हैं? उनकी प्रेरणा क्या है? उनका उद्गम कहाँ से हो रहा है? शायद नहीं|
तो बात कुछ ऐसी है की दुनिया को रोज़ एक नया शिगूफा मिलता है उन दिमागों से जो किसी न किसी खुराफात में दिन-रात लगे रहते हैं| फर्क सिर्फ इतना है की इनके दिमाग दूसरों की ज़िन्दगी में तकलीफें बढाने से कहीं बड़े मंसूबों से भरे होते है| ये रोज़ नए-नए ख़याल पैदा करते हैं| कुछ को हम और आप तुरंत ही मार देते हैं और फूले नहीं समाते| कुछ हैं जो विज्ञान और समाज की आनुपातिक प्रगति ना हुए होने के कारण भविष्य के लिए संजो के रख दिए जाते हैं| फिर जो बाकी का मसाला बचता है उस पर ये पागल लोग काम करते हैं|
अगर आवश्यकता आविष्कार की जननी है तो सपने और उन्हें सार्थक करने की जिजीविषा उसका पिता| क्या, अमूमन, बिना पिता के प्रजनन संभव है? नहीं न! तो बस ठीक उसी तरह सपनों और कल्पनाशीलता का भी अपना महत्त्व है| कितना संभव होता समुद्र की गहराइयाँ नाप लेना यदि कल्पना न होती? उसे चीर के उसके गर्भ तक जाने का दुस्साहस न होता? जी, दुस्साहसी ही रहा होगा वह जीवट प्राणी जिसने पहली बार अपनी सीमा समुद्र तल तक बढाई होगी| सिर्फ साहस से होता होता तो शायद हर दूसरा व्यक्ति कूद पड़ता| क्या संम्भव होता चाँद पर चहल-कदमी करना या फिर बज़ एल्ड्रिन की तरह चाँद की सतह पर पहुँच कर पेशाब करना ? उसकी तो शायद उतनी कोई आवश्यकता नहीं थी? मतलब ये कि उस से भी कहीं अधिक ज़रुरी मुद्दे थे और हैं जिन्हें हमारे वक़्त और संसाधन की और भी ज्यादा ज़रूरत है| क्या आसान रहा होगा मंगल ग्रह तक जाना? या शुरुआत में उसके बारे में सोच भी पाना ? क्या आसान रहा होगा आणविक उपकरण बना पाना ? क्या कुछ अटपटा नहीं रहा होगा जब पहली बार किसी ने एक शरीर को काट कर उसकी चिकित्सा की बात की होगी? क्या मुश्किल नहीं रहा होगा छोटे-छोटे लकड़ी के टुकड़ों से बड़े-बड़े पहिये बनाना ? कितना आसान रहा होगा अपने से इतर भाषा वाले से बात कर पाना ? या जो बोल-सुन नहीं सकते उनके लिए एक अलग तरह की भाषा-शैली तैयार कर पाना ?
ये सब कुछ, और इस से भी कहीं ज्यादा दुष्कर कामों को अंजाम दिया है हमने| और उन सब कामों की तह में रहा होगा एक सपने देखने वाला कल्पनशील दिमाग, एक कुछ भी कर उसे सच करने की जिद रखने वाला जुनूनी आदमी, और शायद उसको ये विश्वास दिलाने वाला कि ‘हाँ, मुझे विश्वास है कि तुम कर सकते हो!’ ये बोलने वाला भी शायद एक अभिभावक या साथी| जैसे किसी पौधे को उगने के लिए बीज, मिटटी, पानी और धूप की आवश्यकता होती है, ठीक उसी तरह सपनो के सच होने की भी अपनी एक पूर्वाकांक्षित शर्तें होती हैं|
तो बस अगली बार जब आपके सामने कोई बच्चा, या बड़ा, आँखों में दुनिया की अलग सी कल्पना लिए, कुछ ऐसा बोले जो आपने पहले न देखा हो, न सुना या पढ़ा हो, तो मान लीजियेगा कि आप किसी नवल, असाधारण, अश्रुतपूर्व कदम की नींव रखे जाने के साक्षी बन रहे हैं| अब उस कपोल-कल्पना वाली नींव पर ईमारत कैसी और कब बनेगी ये उस क्षण में आपके बर्ताव पर निर्भर करेगा| ये आपको तय करना है कि वो सपना कल का सूरज देखेगा या फिर आज की शाम के साथ ढल जायेगा? आप उसको नकार देते हैं है या फिर एक प्रोत्साहन देते हैं, ये आपके विवेक पर है|
हाँ, तो वो सपनों में देखी ईमारत कल का सूरज देखेगी ना?
#भईया_उवाच
(चित्र इन्टरनेट से साभार|)
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