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Friday, 21 July 2017

ऐ अँधेरे!

ना कोई हलचल न ही सरसराहट,
बस तुम, तुम और तुम ही तुम,
उन  तमाम परतों से निकल कर ,
जो उजाला तुम्हे दिन भर ओढा के रखता है,
निकल कर आये तुम,
आये;  और गहराते  गए,
और फिर एक घुप्प गहराई  में तब्दील हो गए,
वो रूप तुम्हारा सबसे सही था,
ईमानदार, सच्चा और सबसे अलग!
न कोई लाग-लपेट,
ना ही खुद को उजला साबित करने की कोई कोशिश,
बस खुद को खुद में डुबाते जाने की एक चाह, एक ख्वाहिश...
हर बीतते पल के साथ तुम्हारा वो खुद से  गहराता  रिश्ता,
और बस शिथिलता से खुद की गहरायी में डूबते जाने की वो भरसक कोशिश,
जब तक कि सुबह का उजाला   आ ना  जाए,
कि अपनी धुंधली चादर लिए ना,
तुम्हे ओढ़ाने को,
और रंगने को, तुम्हे
अपने मटमैले रंग में,
जिसे दुनिया उजाला मान के तुम्हारे अस्तित्व को नकार देती है,
पर तुम तब भी होते हो,
उस उजाले की झिलमिल परत के नीचे ही सही,
और फिर,
जब वो परत हलकी होती है आने वाली शाम के साथ,
तुम फिर  कोशिश करते हो सिर उठाने की,
निकलते हो,
अपना अस्तित्व ढूंढते से,
और फिर पा ही लेते हो खुद को,
फिर एक बार,
खुद में खुद को खो देने को,
ऐ  अँधेरे !!

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