छोटे थे तो पढ़ा था कि
सीमाएं अलग करती हैं
एक क्षेत्र को दूसरे से,
लोगों को दूसरे लोगों से,
एक भाषा-भाषी को दूसरे से,
पर वो दिखती नहीं थी|
अब दिखने लगी हैं...
हाँ, वो सीमाएं|
आज थोड़ी ऊंची दिख रही है,
बगल वाली दीवार |
जिनकी छत पे धूप सेंका करते थे,
सुना है अलग हैं वो लोग,
हमारी जात के नहीं हैं |
आज जात ने ढँक लिया
सूरज की धूप को भी |
लगता है कॉम्प्लान पी लिया है
दुसरी बगल वाली दीवाल ने भी,
शायद |
मिल के किस्से सुनते थे,
उन दादी से और
सपनों में खुद हीरो बन लेते थे,
उनकी छत पे सारे बच्चे;
पर आज दीवार बड़ी हो गयी,
हमारे सपनों से,
सुना है विधर्मी हैं हम उनके|
पीछे वाली बची थी,
पतंग उड़ानी सीखी थी जहाँ,
सुना है वो चाचा
अब ज्यादा कमाने लगे हैं|
मेरी पतंग की उड़ान कम पड़ गयी
उनकी कमाई के आगे |
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