जी, मैं भीड़ हूँ !
हर दिन उमड़ती-मरती
निराशा-आशा का नीड़ हूँ।
जी हाँ, मैं भीड़ हूँ।
इन सब ढकोसलों में पारंगत,
सारी धूर्तताओं का ज्ञानी,
बस शकुनि सा प्रवीण हूँ,
हाँ, मैं भीड़ हूँ।
दम तोड़ चुकी महत्वाकांक्षाओं और
दम भरती कुंठाओं को दूसरों पर
थोपने में चकाचक उत्तीर्ण हूँ,
कहा न भाई, मैं भीड़ हूँ।
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