चलो आज अपने पर खोलते हैं,
जो नहीं है कहा यूँ अब तलक़,
कुछ कर, आज वो सब बोलते हैं;
चलो आज अपने पर खोलते हैं।
वो जो पड़ी है बंद पुड़िया सपनों की,
पुरानी सन्दूक में उसे खोजते हैं,
बहुत धूल जम गयी सी लगती है,
चलो इन रिश्तों की गिरहें खोलते हैं,
डुबा दें इस शोर को बेशक़ इस कदर,
के इशारों में निगाहों के हुनर बोलते हैं,
वो लुका-छुपी, वो कागज़ की कश्ती,
वो बारिश के पानी की छुवन ढूंढते हैं,
न छोटी पड़ जाये कहीं ये बड़प्पन की चादर,
चलो वो खोया-हुआ सा बचपन ढूंढते हैं,
वो जो था हम में-तुम में, पर नहीं दिख रहा,
लगा जान उसको अब हम ढूंढते हैं,
चलो आज अपने पर खोलते हैं,
जो नहीं है कहा यूँ अब तलक़,
कुछ कर, आज वो सब बोलते हैं;
चलो आज अपने पर खोलते हैं।
#काफ़िया_मिलाओ
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