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Thursday, 6 December 2018

~ अन्दर का शोर ~

वो  अपने अन्दर के शोर को दबाने के लिए
एक बड़ा शोर ढूँढता  रहा।
और फ़िर उसी शोर में  कब ग़ुम हो गया,
इस बात का कोई शोर नहीं हुआ।

उसको नहीं सुनाई दिया शायद
वो संगीत जो निकल रहा था,
छनती चाय,
चाशनी में डूबती जलेबी,
तलते पकौड़े  और
जलते  चूल्हों  से....

वो आवाजें  जो आ रही थीं
सरकती रहट,
रेंगते रिक्शे,
चलती बस  और
गुज़रती ट्रेन से...

वो खनक  जो निकल रही  थी,
मैदान की सीटी,
फ़ुटबाल बनते टिफ़िन,
खोती  बोतलों  और
खनकते  सपनों से...

वो थाप जो पैदा होती थी,
ढोली के ढोलक,
मदारी के डमरू, 
साधू के मंजीरे और
मंदिर के घंटे से...

वो पुकार जो निकलती थी
किसी बच्चे के तुतलाने,
गाय  के रंभाने,
बकरी के मिमियाने  और 
उस बूढ़े तोते के दोहराने से...

वो चहक जो पैदा होती थी,
चरचराते झूले,
उस  बच्चे  की गुल्लक,
उस जीते हुए कप और
कैरम में टकराती गोटियों से...

और नहीं सूँघी शायद उसने
मंदाती, थमती और फिर
कुछ भी कर चल पड़ती हुई ज़िन्दगियाँ,

और...

नहीं पहचाने शायद,
अपनी ही ज़िन्दगियों  के विरले संगीत पर
अपनी ही  धुन पर थिरकते लोग,
जो  शायद उस जैसे ही थे;
पर कभी-कभी रुक कर,
सुन लेते थे वो संगीत,
जो उपजता था कभी
उनके आस-पास और
कभी उनके अन्दर से ही...

#शोर
#ज़िन्दगी
#ViciousCalledLife

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