हमें याद है एक बार हम गर्मी की छुट्टियों में हम प्रतापगढ़ में अपने पैतृक घर गए हुए थे।
अब दोपहर में कौन ही सोये, इसके लिये जब दादी और चाची लोग आराम करने को होती थीं तो हम सारे भाई मिल कर बगिया में चले जाते थे।
हमारे पीछे-पीछे आते थे चिन्नी-मिन्नी बच्चे।
इनको वापस जाने को कहो तो मिन्नतें करते कि बस पेड़ के आस-पास रहेंगे। शिकायत भी नहीं करेंगे और न जाने क्या-क्या दलीलें।
हम लोग या तो आम तोड़ते और खाते या फिर अगर आम तब तक नहीं आये होते तो पेड़ पर चढ़ते या चील्हर-पाती (जो शायद असल मे चील और पत्ती रहा होगा) खेलते थे।
अब चूँकि हम लोग थोड़े बड़े थे तो चढ़-उतर सकते थे।
पर जो ये पिछलग्गू चिन्नी-मिन्नी आते थे वो खुद से चढ़ नहीं पाते थे और थोड़ी देर में हताश-निराश होकर चिढ़ जाते थे।
फिर नाटक शुरू होता कि हमें भी खिलाओ खेल।
पर भाई, जब पेड़ पे चढ़ नही सकते तो खेलोगे कैसे?
बताओ भला?
अब चूँकि चोरी से आ गए हैं और वापस जाने पे धुलाई पक्की है तो वो मुखबिर बनने को बेताब हो जाते थे।
कितना ही समझाओ कि 'आओ, खेलो!' या फिर 'पहले सीख लो, फिर खेलना!' पर नहीं। उनकी वापस जाने की रट जो शुरू होती तो बन्द होने का नाम नही लेती।
अब खेल तो सके नहीं और ठीकरा फोड़ना होता था हमारे सर, तो दौड़ते हुए घर पहुँचते और जा कर दादी के सामने ऐसे बात रखते जैसे इनको हम जबरदस्ती ले गए थे।
और फिर दादी की संटी और हमारी सिट्टी-पिट्टी ग़ुम...
कसम से अब भी याद आता है तो इन सब को पटक के मारने का मन करता है।
अरे हाँ, ये कर्नाटक में जो नाटक चल रहा है, उसे देख कर ही याद आया था।
बाकी आप खुद समझदार हैं।
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