अब लोग चिट्ठियाँ नहीं लिखा करते,
जी लेते हैं ऑनलाइन, ऑफलाइन,
पीट लेते हैं की-बोर्ड
कर लेते हैं इंतज़ार उधर से जवाब आने का,
कुछ मिनटों तक
और जो ना आये संदेश, तो भेज देंगे एक और सन्देश
और कर लेंगे इंतज़ार कुछ और मिनटों का,
पर कभी कागज़-कलम उठाने की ज़हमत नहीं किया करते,
अब लोग चिट्ठियाँ नहीं लिखा करते!
चिट्ठियों की आदत भी खराब जो है,
सहेज के रख लेती हैं सब,
किस्से – यादें – अलफ़ाज़ - जज़्बात, कहे – अनकहे, सारे
और फिर ज़िद करती हैं,
ज़िन्दा करने की, रखने की उनको,
जो कि अब जा चुके हैं
वक़्त - इंसान – हालात – जज़्बात...
इसीलिए शायद,
अब लोग चिट्ठियाँ नहीं लिखा करते!
अब तो जी ज़माना है तुरन्त का|
मिलो, हाथ बाद में मिलाना, पहले गले मिलो !
साथ चलो, संग रहो, और फिर
दिल मिले ना मिले, फोटुओं में मुस्कुराते रहो
दिल हो ना हो, ठहाके लगाते रहो,
और फिर एक दिन खिसक लो, धीरे से
होने को जुदा, फिर कभी ना मिलने को,
ये मिलने, जुड़ने और संजोने का झंझट ही तो है,
शायद इसीलिए
अब लोग चिट्ठियाँ नहीं लिखा करते!
अजी, अब तो फ़ास्ट-फ़ूड का ज़माना है,
फ़ास्ट-फ़ूड!
समझते तो होगे ना?
अब लोग अरमानों के सीजने-पकने का इंतज़ार नहीं किया करते,
अब तो भाई चाहिए सब तुरंत,
झटपट – फटाफट – सरपट|
अब ये नहीं जानते की उस अनिश्चितता का आनंद क्या है,
अब ये सन्देश का पग-पग जाना तय नहीं किया करते,
अब लोग चिट्ठियाँ नहीं लिखा करते!
अरे, अब वक़्त है इंस्टेंट का|
इंस्टेंट समझते हो ना?
जैसे इंस्टेंट कॉफ़ी, इंस्टेंट मैसेज, इंस्टेंट अपडेट...
ठीक वैसे ही, इंस्टेंट |
इस इंस्टेंट की गर्म-आंधी में
धीमी आँच पे पकने वाली बात तक नहीं किया करते,
अब लोग चिट्ठियाँ नहीं लिखा करते!
अमा, अब तो रिश्तों को कड़क होना पड़ता है,
भुनाने के लिए,
वो एहसासों के पुराने, नर्म नोट,
इस खुले, तेजड़िए बाज़ार में नहीं चला करते,
अब तो सब ऑनलाइन-ऑफलाइन का खेल बचा है,
काश कि लोग अब भी चिट्ठियां लिखा करते...
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