सुनो !
चलो मनाते है जश्न...
"जश्न ?"
"हाँ, जश्न अँधेरे का! "
"अँधेरे का ? "
"हाँ, अँधेरे का !"
"यही अँधेरा , जो स्याह है,
थोड़ा अकेला भी,
भटका हुआ सा,
गुमनाम..."
"यही अँधेरा जो प्रतीक है,
हार का,
रात का,
परछांई का,
निराशा का ;
दिन-ब-दिन कम होती,
उस डूबती प्रत्याशा का !"
"अँधेरे का भी कोई भला जश्न होता है?"
"उसका क्या कोई जश्न मनाता है?"
"अरे ! तो क्या हुआ? हम मनाएंगे न !!"
अँधेरा ये,
सच्चा है,
इसलिए एकाकी है;
बाकी सब जब बीत लिए,
ये अँधेरा ही रहता बाकी है!
उजाले का क्या है?
जो रंग डालो,
वो उसका हो लेता है।
सराहो ज़रा इसे,
इस अँधेरे को ,
सब को समा लेता खुद में ;
और खुद के रंग को नही खोता है !
बादल से,
काजल से,
उन चंचल पलकों की हलचल से,
उस तालाब की फैली काई से,
उस युवा स्तब्ध अमराई से,
इस कंक्रीट से चिपके तार से;
उस रेंगती मोटर के धुएं से,
उस सूखे पड़ते कुएं से;
इन बिजली के नंगे तारों से,
उन टूटते, डूबते सितारों से;
उस कच्चे तेल की घानी से,
उस जमे, ठहरे पानी से;
इन पहियों की घिसावट से,
उस बच्चे की कच्ची लिखावट से;
उस टूटी पेन्सिल की नोक से ,
उस ढोंगी तांत्रिक की टोक से ;
उसके उस पुराने त्रिशूल से,
उस पुश्तैनी हवेली की जमी धूल से;
उस हवेली के उस मुंडेर से,
उस सरसों के बिखरे ढेर से;
उस सरसों से निकली खील से,
उस जंगल में मरते भील से;
उस भील की उन गुफाओं से,
एलोरा की उन कंदराओं से;
अजन्ता की घिसी दीवारों से,
क़ुतुब की झुकती मीनारों से;
क़ुतुब की उस ऊँचाई से,
संसद भवन की गोलाई से;
संसद की उन मेहराबों से,
सुंदरबन के मुहानों से;
सुंदरबन की दलदल से,
एक अशांत युवा की खलबल से;
उस अशांत युवा के प्रयासों से,
उस दलाल-स्ट्रीट के कयासों से;
दलाल-स्ट्रीट के धूर्त विजेताओं से, ज़मीर के बेहिचक विक्रेताओं से;
और जिस भी कोने में पसरा बैठा हो ,
हर उस कोने से;
चलो, ले आते हैं ना,
थोड़ा सा अँधेरा... "
#भईया_उवाच
kya gahrayi hai.. pehle padhne se lagta hai you can find optimism in all pessimism.. jai ho..
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