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Tuesday, 15 November 2016

जश्न अँधेरे का!

सुनो !
चलो  मनाते है  जश्न...
"जश्न ?"
"हाँ,  जश्न  अँधेरे  का! "

"अँधेरे  का ? "

"हाँ,  अँधेरे  का !"

"यही अँधेरा ,  जो  स्याह है,
थोड़ा  अकेला भी,
भटका  हुआ सा,
गुमनाम..."
"यही  अँधेरा जो  प्रतीक है,
हार का,
रात  का,
परछांई  का,
निराशा का ;
दिन-ब-दिन  कम होती,
उस डूबती  प्रत्याशा  का !"

"अँधेरे का भी कोई भला  जश्न होता है?"

"उसका क्या कोई जश्न मनाता   है?"

"अरे !  तो क्या हुआ?  हम  मनाएंगे  न !!"

अँधेरा  ये,
सच्चा  है,

इसलिए एकाकी  है;

बाकी  सब  जब  बीत लिए,

ये अँधेरा ही  रहता  बाकी  है!

उजाले का  क्या है?

जो  रंग डालो,
वो उसका  हो लेता  है।

सराहो  ज़रा  इसे,
इस अँधेरे  को ,
सब को समा  लेता खुद में ;
और खुद के रंग को  नही  खोता है !

बादल  से,
काजल  से,
उन चंचल  पलकों की हलचल से,

उस तालाब की   फैली  काई  से,

उस  युवा स्तब्ध  अमराई  से,

इस  कंक्रीट  से  चिपके  तार  से;

उस  रेंगती  मोटर  के धुएं  से,
उस सूखे  पड़ते  कुएं  से;

इन  बिजली  के  नंगे  तारों  से,
उन टूटते,  डूबते  सितारों  से;

उस  कच्चे  तेल की  घानी  से,
उस  जमे,  ठहरे  पानी  से;

इन  पहियों  की घिसावट से,
उस  बच्चे की  कच्ची   लिखावट  से;

उस टूटी पेन्सिल की नोक से ,

उस ढोंगी तांत्रिक की टोक से ;

 

उसके उस पुराने त्रिशूल से,
उस पुश्तैनी  हवेली की जमी धूल  से;

उस हवेली के उस मुंडेर  से,
उस सरसों के बिखरे ढेर से;

उस सरसों से निकली खील  से,
उस जंगल में मरते भील से;

उस भील की उन गुफाओं से,
एलोरा की उन कंदराओं से;

अजन्ता  की घिसी दीवारों से,
क़ुतुब  की झुकती मीनारों से;

क़ुतुब की उस ऊँचाई से,
संसद भवन  की गोलाई से;

संसद की  उन मेहराबों  से,
सुंदरबन के मुहानों से;

सुंदरबन की दलदल से,
एक अशांत युवा की  खलबल से;

उस अशांत युवा के प्रयासों से,
उस दलाल-स्ट्रीट के कयासों से;

दलाल-स्ट्रीट के धूर्त विजेताओं से, ज़मीर के बेहिचक विक्रेताओं से;

और जिस भी कोने में पसरा बैठा हो ,

हर उस कोने से;

चलो, ले आते हैं ना,

थोड़ा सा अँधेरा... "

#भईया_उवाच

1 comment:

  1. kya gahrayi hai.. pehle padhne se lagta hai you can find optimism in all pessimism.. jai ho..

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