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Monday, 26 September 2016

लो, बड़े हो गये हम।

पहले बड़े होने का मतलब होता था,
अपने फीते खुद बांधना,
खाना  अपने हाथों से खाना,
दूध जल्द से जल्द ख़तम करना।

फिर कुछ समय बाद,
बड़े होने का मतलब बदला,
और उसमें शामिल हो गया,
अपने कपड़े खुद धोना,
खेल के आने के बाद चुपचाप पढ़ने बैठना
होम वर्क खुद से करना ।

फिर कुछ समय और बीता,
और बड़े होने के मतलब बदले,
अब जुड़ता गया,
दोस्त सही से चुनना,
घर में सिर्फ चुनिंदा लोगों को लाना,
माँ का हाथ बटाना,
पिता जी के सामने अदब से पेश आना।

और फिर,
एक दिन अचानक,
हम बड़े हो जाते हैं,
रख के उस बचपन को पीछे,
जो शायद अब भी कहीं कुलबुला रहा होता है,
अन्दर;
उठा लेते हैं गट्ठर ज़िम्मेदारियों का,
जिसकी गाँठ बंधी है चुपचाप किये गए वादों से,
माँ की आशाभरी मुस्कानों से,
पिता के ज़्यादातर झूठे गर्व से,
और अपने अन्दर की सामाजिक शर्म से;
और बस,
उन अधजन्मे शिशु से सपनों को छोड़,
बढ़ जाते  हैं आगे,
बड़े होने के लिए...

खुद से खुद की रेस में जीतने के लिये,
खुद को ही कहीं पीछे छोड़ कर,
खुद से किये अनगिनत वादों को तोड़ कर,
सपनों के बड़े-बड़े नोटों को पतला सा मोड़ कर,
भूल जाते हैं किसी कोने में छोड़कर,
हसरतों को सुखा देते अपने ही हाथों से,
पूरी तबियत से  निचोड़कर,

और बस,
बरबस ही,
बिना इच्छा के,
हो जाते हैं बड़े,
बचपन अभी भी कुलबुला रहा होता है,
कहीं अन्दर,
सपने अभी भी सांस ले रहे होते हैं,
किसी भूले से कोने में,
हसरतों को रौंद कर अपने ही कदमों से,
खुद को खुद से रेस में हराने  के लिए,

लो, हो गये हम बड़े।।

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