तुम होते हो तब भी,
और नहीं होते तब भी,
उंगलियाँ बरबस ही उठ जाती हैं,
पहुँच के आँखों के बीचोंबीच,
नाक के सिराहने पर,
माथे की निचली किनारी पर,
ढूंढती हैं तुमको ।
तुम होते हो तो साथ होता है,
सब कुछ साफ़-साफ़ सा होता है,
सब साफ़-साफ़ दिखता है,
कोई धुंधलका नहीं,
कोई संशय नहीं,
और ग़र नहीं भी होते,
और ऊँगली लौट आती है, बैरंग;
तो मुस्कुरा देता हूँ,
अपनी इस आदत पर...
यही,
बीच वाली ऊँगली से तुम्हे ढूंढने की,
यूँ ही कभी,
यकायक ।
फिर भी,
जैसे भी हो,
साथ तो देते हो,
तुम,
मेरा ...
मेरे चश्मे ।।
#भईया_उवाच्
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