पूनम की झिलमिल रौशनी में नही,
मिलूँगा मैं अमावस की चादर के अन्दर !
उस चिर-प्रतीक्षित स्वाति नक्षत्र में नही,
मिलूँगा मैं उस भयंकर सूखे की बेला में !
उस नव-पल्लवित फुलवारी के बीच नहीं,
मिलूँगा मैं उस बियाँबान मरुस्थल के रेत के टीलों के बीच !
उस नए खड़े मॉल की एलीवेटर के घूमते पट्टों के सहारे टिक कर नहीं,
मिलूँगा मैं उस अन्जान, स्याह सड़क पर !
शरद की उस पहली ओस पर चलते हुए नहीं,
मिलूँगा मैं उस तपती अकेली राह पर !
चकमक करती इस जगमगाहट में नहीं,
मिलूँगा मैं उस दोराहे के बंद, निराश मुहाने पर !
उन तालियों की गड़गड़ाहट के बीच नहीं,
मिलूँगा मैं उस नितांत अकेले पल में !
उन रुबाइयों, कव्वालियों, गीतों और विलास में नहीं,
मिलूँगा मैं अंतर्द्वंद्वों और संशयों के क्षण में !
उन उत्त्तेजित करती और दंभ भरती सराहनाओं के बीच नहीं,
मिलूँगा मैं उस वास्तविक विडंबनाओं के करीब !
उन सफताओं की अट्टालिकाओं पे चढ़ चिल्लाता हुआ नहीं,
मिलूँगा मैं उस जीवन समर के जूझते पल में !
... तुमसे !!
क्यूंकि,
तब तुम , तुम होगे ।
बस तुम !
और मैं,
... हम !!
#भईया_उवाच
#BhaiyaSpeaks
#हम
Sundar ! :)
ReplyDeleteशुक्रिया!
ReplyDeleteमिलेंगे हम| :)