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Sunday, 15 March 2015

उलझन?

सुनो,

एक उलझन  सुलझाओगे?

क्या ज़रूरी  है  भटकाव?

ठहराव के लिए?

शायद...

जैसे  अथाह  समंदर  में तैर के,

ग़र  मिले एक बियाबान  टापू,

लगेगा वो,

सदा अलभ्य से अमृत सा...

खोये हुए से  बचपन  सा...

चिढाते हुए औघड़पन सा...

चिर-वांछित  यौवन  सा...

चमकते  हुए इक  दर्पण सा...

जो ना मिले उस अपनेपन सा...

एक  सुसुप्त उर के  स्पंदन सा...

किसी इष्ट  के साष्टांग वंदन सा...

मन के शिशु के  मूक  क्रंदन सा...

उस प्रेयसी के प्रथम चुम्बन सा...

उस विरह  वेला के  बंधन सा...

उस  पुनर्मिलन  के आलिंगन सा...

मन के   अंतरुद्वेलन सा...

भावनाओं  के  संवेगन  सा...

सफलताओं  के संवर्धन  सा...

विफलताओं  के  घर्षण सा...

जीवन के प्रतिपल की अनिश्चितता  का...

जल-वायु-गगन-अंतरिक्ष की शाश्वतता का...

अब प्रश्न दूसरा है...

कि  ये ठहराव  समंदर में था...?

या  बहाव  टापू में...?

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